शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

बेमानी सब..........













अपनों का अपनापन झूठा सा लगता है
क्या कहें क्यों सब बेमानी सा लगता है

था सच जो दिखावा सा लगता है
हर रिश्ता अब तो टूटता सा लगता है

धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
पड़ गई गांठ उसमे गुमां सा लगता है

चमकता था हमेशा वो चाँद झूठा लगता है
चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है

था बन्धन रिश्तों का धोखा सा लगता है
हर कड़ी का सिरा खुला सा लगता है

रिश्तों का हर पहलु बदला सा लगता है
खुद जिंदगी से अपनी डर सा लगता है

छोटा दायरा सोच का बढ़ा सा लगता है
तड़पने के सिवा नहीं काम कुछ लगता है

जिंदगी रह गई है इन सोचों के लिये शायद
कुछ कम कुछ ज्यादा सबब रहता है................!!


                                                                                                           

                                                                                      सु..मन 

25 टिप्‍पणियां:

  1. चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है.....
    आप की रचना चोरी हो गयी है ..... इस लिंक पर जाकर देख ले ..
    http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_9582.html

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  2. बंटी जी....
    आप तो चोरी करने में माहिर लगते हैं ..........

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  3. bahut hi khubsurat rachna...
    kaafi achhi comments dene ke mood me tha lekin is banti chor ke karan mood off ho gaya hai.....
    pata nahi kahan se yeh nayi musibat aan padi hai....

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  4. धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
    पड़ गई गांठ उसमें गुमां सा लगता है...
    बदलते रिश्तों के फ़रेब...
    और इससे पैदा होने वाले दिल के हालात को...
    बहुत भावपूर्ण शब्दों में पेश किया है आपने.

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति...लेकिन इतने अविश्वास के साथ जीना मुश्किल है...कहीं तो विश्वास करना पड़ेगा.

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  6. सुमन जी रिश्तों का दर्द झलकता है आपकी नज़्म से .....

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  7. आह बहुत खूबसूरत कविता लिखी मनो दिल निचोड़ कर रख दिया हो.

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  8. आदरणीय सुमन ‘मीत’ जी
    नमस्कार !

    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  9. "dhaga tha vishwaas ka uljha sa lagta hai..."
    bahut sunder rachna...bahut sunder bhaav...aapko badhaayee...

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  10. कठिन समय में सुख के मानक दुख देने लगते हैं।

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  11. बेमानी है सब ... कई बार तो विरक्त मन यही सोचता है, मुझको समझाते हैं कुछ न समझनेवाले

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  12. सच कहा है ... विश्वास का कच्चा धागा तोड़ना नही चाहिए ... रिश्तों को बाँध कर रखना चाहिए ...
    बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है ...

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  13. धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है,
    पड़ गई हांठ उसमें गुमां सा लगता है।

    भावनाओं को व्यक्त करने में आपके शब्द सफल हैं...अच्छी ग़ज़ल।

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  14. धागा विश्वास का उलझा सा लगता है, सुमन जी बहुत खूब लिखा है आपने। आभाऱ।
    http://sudhirraghav.blogspot.com/

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  15. --सुन्दर गज़ल, भाव पूर्ण अभिव्यक्ति व कथ्य हैं--
    ---तकनीकी द्रष्टि से--
    ----सभी शेरों की दोनों पन्क्तियां रदीफ़ से युक्त हैं अतः ये ’स्वर्णिम मतले’ हैं, जो गज़ल के कलात्मक सौन्दर्य को उभारते है।
    ---”सा लगता है’--रदीफ़ है व ’आ’ मात्रा का काफ़िया--प्रथम व अन्तिम शे’रों में काफ़िया ’इ’तथा ’अ’ है।, अन्तिम शेरों में ’सा’गायब है।

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  16. सुंदर और सार्थक प्रस्तुति ..
    आभार ........................

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  17. "जड़ आज मेरी उस इन्सान ने काट दी थक के बैठा था जो मेरी छाव मैं !"-- ये दुनियां बाहर से सफ़ेद और अंदर से काली है ! अच्छी रचना !

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  18. dil ke jo bhi bhaav hai vo kalam ke jariyekagaz par utar aayein hain......

    behtreen kalam.......

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