सोमवार, 2 जून 2014

बेआवाज़ ख़ामोशी











सब ख़ामोश है अब
लफ्ज़ भी
एहसास भी
बंद किताब की तरह .....

ख़ामोशी की सिलवटें
बढ़ रही
हर पन्ने पर
आहिस्ता-आहिस्ता......

बीच-
अब कुछ भी नहीं
सिवाय  
बेआवाज़ ख़ामोशी के......

हाँ, बेढब यादें जिल्द सी
अब तक किताब को समेटे है शायद !!


सु..मन

24 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. पसंद करने के लिए शुक्रिया अशोक खत्री जी

      हटाएं
  2. गहराई से निकली मन को गहरे तक छूती रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया ओम जी । बस आपका आशीर्वाद है यूँ ही मार्गदर्शन करते रहें ।

      हटाएं
  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन चाहे कहीं भी तुम रहो; तुम को न भूल पाएंगे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेढब यादें जिल्द सी ...... शायद समेटे रखती हैं या फिर बस आदत। गहरे अहसास वाली कविता है। शुभ कामनाये आपको

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (03-06-2014) को "बैल बन गया मैं...." (चर्चा मंच 1632) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  7. जीवन की अनकही पीड़ा को व्यक्त करती
    प्रभावपूर्ण और गहन अनुभूति की रचना
    बहुत सुन्दर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई------

    आग्रह है---- जेठ मास में--------

    उत्तर देंहटाएं
  8. तो यह ख़ामोशी बाहर ही बाहर की ,सारे शब्द ज़िल्द में बँधे वहीं के वहीं - बस खुलने की कसर है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. दिल की गहराई से निकली रचना ...उम्दा अभिव्यक्ति...!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. जिल्द सी यादें और अहसासों की किताब , वाह सुन्दर प्रयोग ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह सुमन ..
    आखिर की दो पंक्तियाँ ...जान हैं रचना की ..बहोत खूब...!!!

    उत्तर देंहटाएं