मंगलवार, 19 मई 2015

शबनमी मोती














....रात 
दर्द की शबनम से 
निकले कुछ हर्फ़ फलक से 
और आ बैठे मेरे सरहाने 
घुल कर अश्कों से 
टिमटिमाने लगे मोती की तरह 
जाने कितने मोती बीन कर 
रख लिए कोरे कागज़ पर 
फिर बंद कर दी किताब 
ज़ेहन में भींच कर |

सुबह तलक -
धुन्धली होती रही रात 
मोती ज़ेहन को चुपचाप शबनमी करते रहे !!


सु-मन 

21 टिप्‍पणियां:

  1. शबनम से महकते शब्द ... नमी का एहसास करा गए ...

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  2. बहुत सुन्दर रचना और भाव

    www.safarhainsuhana.blogspot.in

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, रावण का ज्ञान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. शबनम सी ही नाज़ुक एवं भीगी-भीगी सी रचना ! बहुत सुन्दर !

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  5. बहुत ही खूबसूरत शब्दों और भावों का सुन्दर सम्मिश्रण।

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  6. साधारण मनुषी भाव से सजी इक असाधारण रचना, लेखनी को नमन

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  7. बहुत ही खूबसूरत शब्दों और भावों का सुन्दर सम्मिश्रण। ​शानदार अभिव्यक्ति

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  8. अहसासों को थपकियों देते मखमली हर्फ़ ।

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  9. शबनम भी भिगो गई.

    सुमन जी बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  10. शबनमी मोती, बहुत ही शानदार रचना। बेहद सुंदर प्रस्‍तुति।

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  11. क्या बात है। बहुत ही सुन्दर रचना।

    http://chlachitra.blogspot.in
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  12. चुपचाप शबनमी करते रहे..............बहुत सुन्दर !

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