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रविवार, 29 नवंबर 2020

मन तुम 'बुद्ध' हो जाना









मन !
जीवन के धरातल पर
उग आयें जब
अभीप्साओं के बीज
आँखों को तर करने लगे
दो बूँद अश्क़
वर्ष दर वर्ष मिटने लगे
उम्र की स्याही
रिश्तों की घनी छाँव भी
देह को तपाने लगे

सुनो मन -
ठीक इसके पहले
तुम निबंधित हो
ले चलना मुझे
देह से परे की डगर
अकंपित, निर्विघ्न
समाहित कर खुद में
मेरा सारा स्वरूप
मन तुम 'बुद्ध' हो जाना !!


सु-मन

11 टिप्‍पणियां:


  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (३०-११-२०२०) को 'मन तुम 'बुद्ध' हो जाना'(चर्चा अंक-३९०१) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 29 नवंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. वाह!! सुमन जी! 'सु' मन से लिखी सार्थक रचना 👌👌👌सस्नेह शुभकामनायें 🙏🙏

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  4. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  5. बहुत सुंदर सृजन मन तुम बुद्ध हो जाना।
    निबंधन से पहले या फिर निबंधन से मुक्त ही तो बुद्ध होना है।
    सुंदर आध्यात्मिक रचना।

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  6. बुद्धम शरणम् गच्छामि । सुंदरतम ।

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  7. आपके ब्लॉग पर आ कर प्रसन्नता हुई। बहुत अच्छा लिखती हैं आप ।
    हार्दिक शुभकामनाएं 🍁🙏🍁

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