कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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बुधवार, 27 अगस्त 2014
शनिवार, 23 अगस्त 2014
पूरे से ज़रा सा कम है ..
बारहा हुआ यूँ कि
ज़ेहन में दबे लफ्ज़
निकाल दूँ बाहर
खाली कर दूँ
भीतर सब
रूह पर पड़े बोझ को
कर दूँ कुछ हल्का
लिखूं वो सब अनचिन्हा
जो नहीं चिन्हित कहीं और
सिवाय इस मन के
...पर
हर बार
लिखे जाने से पहले और बाद के अंतराल में
लौट आते हैं कुछ लफ्ज़
सतह को छूकर , बेरंग से
बैठ जाते हैं आकर
मन के उसी कोने में चुपचाप
यूँ तो पन्नों पर
पसर जाती है एक पूरी नज़्म
फिर भी
कलम तलाशती रहती है
उन ख़ामोश लफ्ज़ों को
मन टटोलता रहता है
कुछ पूरा ..वो अनचिन्हा !!
(अधूरा कुछ भी नहीं ..जो कुछ है उसका होना है ..उसका घटित होना ...पूरा या अधूरा नामालूम किस घड़ी मन में चिन्हित हुए ...मालूम है तो बस इतना कि पूरे से ज़रा सा कम है ...)
सु-मन
शनिवार, 9 अगस्त 2014
भैया सुनो !
Bhaiyu आपके लिए
भैया सुनो !
नहीं जानती
कि क्यूँ कर
शुरू हुआ होगा
ये रक्षा बन्धन
कब,किस वजह से
बाँधी होगी किसी बहन ने
अपने भाई की कलाई पर
पहली राखी |
जानती हूँ
तो बस इतना
कि कच्चे धागे की डोरी को
बुना है मैंने
विश्वास के ताने बाने से
लगाए हैं इसमें
अपने एहसास के रंग
और बांध दी है
तुम्हारी लम्बी उम्र की
गुढी गाँठ |
बदले इसके
नहीं मांगती कुछ
सिवाए इसके
कि ता-उम्र सम्भाले रखना
ये पवित्र बन्धन
मेरी ‘राखी’ को ना होने देना तुम राख !!
तुम्हारी बहन
सु-मन
(मेरी इस रचना को राजस्थान की Daily News अखबार के 'खुशबू' अंक में प्रकाशित करने के लिए वर्षा मिर्ज़ा जी का बहुत बहुत आभार)
(मेरी इस रचना को राजस्थान की Daily News अखबार के 'खुशबू' अंक में प्रकाशित करने के लिए वर्षा मिर्ज़ा जी का बहुत बहुत आभार)
सोमवार, 4 अगस्त 2014
बाबुल..तेरे जाने के बाद
बाबुल !
मौन हैं ये क्षण
पर भीतर
अंतर्द्वन्द गहरा
फैल रही
मानसपटल पर
सारी समृतियाँ
झर रहे हैं वो पल
आँखों से निर्झर
चल दिए थे
जब तुम
निर्वात यात्रा
छोड़ सारे बन्धन
... बीते दो बरस
माँ भी बदल गई
दिखती है उम्रदराज
हंस देती है बस
बच्चों की चुहल से
वैसे रहती है
चुपचाप |
देखो ! उस कोने में
बीजा था जो तुमने
प्यार का बीज
अब हरा हो गया है
एक डाली से
निकल आई हैं
और तीन डालियाँ
खिलते है सब मौसम
उसमें तेरे नेह के
अनगिनत 'सुमन'
माँ सींचती है उनको
अपने हाथों से
करती है हिफाज़त
हर आँधी से
यही है उसके
जीने का सामान
यही तेरी निशानी भी है !!
सु-मन
बुधवार, 23 जुलाई 2014
उसने कहा था
बुत के समान
जिन्दा लाश बनकर
कब तक ढोते रहोगे
जिंदगी का कफ़न
आओ !
जड़ को चेतन में बदल कर
फूलों के जहाँ में
जीना सीखा दूँ
चलो !
मरीचिका के आईने को
पार कर देखो
दर्पण के पहलू में
अनेक बिम्ब दीखते हैं
संभल कर पोंछ दो
गर्द की परत
निखर आयेगी हर छवि
अंतस की गहराई में
करो और देखो
जिंदगी के दामन में
हज़ारों रंग बिखरे हैं
तुम्हारे लिए ..!!
सु-मन
शुक्रवार, 4 जुलाई 2014
मंगलवार, 24 जून 2014
दुख - सुख
बीत जाने पर
नहीं रहता दुख , दुख सा
मिटटी हो जाता है
उपजाऊपन से भरा
जिसमें रोपा जाता है
सुख का बीज |
जानते हो !
कैसे ?
ज्यूँ डाली टूट जाने पर
नहीं रहता जब उसका वजूद
पत्ते सूखकर
बिखर जाते हैं राह पर
तब उस राह से गुजरते हुए
समेट लेता है उनको कोई
जला लेता है अलाव
तो जानते हो
उन पत्तों की टूटन का दर्द
दवा बन जाता है
डाली से बिछोह का दुख
तब दुख नहीं रहता
अलाव में जलकर भस्म हो जाता है
होती है उसे सुख की अनुभूति
राख हो जाने के बाद |
दरअसल
हर दुख के धरातल पर
पड़ती है आने वाले सुख की नींव
और
हर सुख के बिछोने पर
जन्मता है आने वाले सुख का अंश !!
*************
सु..मन
( एक दर्द की याद में ...एक बरस बीत जाने पर )
शुक्रवार, 6 जून 2014
ये एक गरम दिन था
जिसमें
सूरज ने उड़ेल दिया
अपना
सम्पूर्ण प्रेम
और
धरा
उस
प्रेम में तप कर
निर्वाक
जलाती रही खुद को
आँख
मिचे |
ये
एक गरम दिन था
जिसमें
नदी खुद पीती रही
अपना
पानी
किनारे
की रेत
प्रेम
की प्यास में जलकर
अतृप्त
शिलाओं के बाहुपाश में
देखते
रही इकहरी होती नदी को
टकटकी
लगाए |
ये
एक गरम दिन था
जिसमें
हरे वृक्ष पड़े थे
औंधे
मुँह
मक्की
बीजे खलिहानों में
अंकुर
ले रहा था
नवजीवन
की अनमोल साँसें
पवन
चक्की मांग रही थी
हिमालय
से अपने हिस्से की
कुछ
हवा |
ये
एक गरम दिन था
जिसमें
जीवन था..अनगिनत
साँसें थी !!
सु..मन
सोमवार, 2 जून 2014
रविवार, 13 अप्रैल 2014
जीना भर शेष ...
जीने के लिए
खाया भी पीया भी
भोगा भी खोया भी
किये अनेक तप चाहा मनचाहा फल
बजती रही मंदिर की घंटियाँ
जलता रहा आस्था की डोर का दीपक
मरने से पहले बुझी नहीं आस की लौ |
बीच सफ़र
डगमगाए कदम बहुत बार
बढ़ा भी रुका भी
गिरा भी संभला भी
बीने कंकर चल दिया राह पर अनथक
चलती रही आंधियाँ
बरसे बहुत गम के बादल
राह का धुंधलका घुलता रहा मंजिल पाने तक |
हर पल हर घड़ी
आती जाती रही बेआवाज़ साँसें
धड़का भी थमा भी
जीया भी मरा भी
मुखरित हुआ मौन बढ़ती रही जिंदगी
बदलते रहे पहर
लिखी जाती रही इबारत वक़्त के पन्ने पर
होती रही भोर काली रात बीत जाने के बाद |
******
(अब तक जो जीया हाथ की लकीरों में था ...लकीरों में थी जिंदगी ....जिंदगी में बहुत कुछ था पर कुछ भी नहीं ....उस कुछ की तलाश में है अभी जीना भर शेष ...मेरे लिए !!)
सु..मन
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