मन बावरा
उड़ने चला
पंख बिना
टूटे पंख
छूटे सपने
बादल बरसे
कलम भीगी
लफ्ज़ पनपे
नज्म उभरी !!
सु-मन
उड़ने चला
पंख बिना
टूटे पंख
छूटे सपने
बादल बरसे
कलम भीगी
लफ्ज़ पनपे
नज्म उभरी !!
सु-मन
कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......