शनिवार, 24 नवंबर 2012

वक़्त



















ऐ राही !
तुम उसे जानते हो
वो तुन्हें जानता भी नहीं
तुम संग उसके चलते हो
वो ठहरता भी नहीं
तुम पथ पर ठोकर खाते हो
वो गिरता भी नहीं
तुम मंजिल भूल जाते हो
वो भटकता भी नहीं
तुम रिश्तों से घबराते हो
वो बंधता भी नहीं
तुम भावों में घिर जाते हो
वो सिमटता भी नहीं
तुम खोकर पाना चाहते हो
वो पीछे हटता भी नहीं
तुम जीत की चाह रखते हो
वो लड़ता भी नहीं
तुम फिर से जीना चाहते हो
वो मरता भी नहीं
तुम उसे जानते हो -२
वो तुम्हे जानता भी नहीं
तुम संग उसके चलते हो
वो ठहरता भी नहीं
वो ठहरता भी नहीं !!


सु-मन  

31 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े दिनों बाद... बड़ी ही सार्थक पंक्तियॉं बधाई सुमन जी।

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  2. वाह सुमन जी बहुत ही खूबसूरती से लिखी गई बेहद सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति
    सादर, अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in

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    1. शुक्रिया अरुण ..आपके ब्लॉग का कार्य कैसा चल रहा है

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (25-11-2012) के चर्चा मंच-1060 (क्या ब्लॉगिंग को सीरियसली लेना चाहिए) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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    1. दिल से आभार शास्त्री जी ..मेरी रचना को स्थान देने के लिए शुक्रिया

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    1. हांजी प्रवीण जी .... वक्त हों या मन रोके कब रुके हैं ...

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  5. बावरे मन से निकली ...इक भेद भरी सटीक बात !
    बहुत खूब ! मुबारक हो !

    वक्त को संभालो.... !!!
    इस जिन्दगी की दी हुई मुफ्त सौगात का
    कोई मूल्य नही पहचानता इस की औकात का???

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अशोक जी ...
      बहुत बढ़िया पंक्तियाँ

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  6. बहुत सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  7. सुन्दर भावाभिव्यक्ति बहुत बहुत बधाई अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर जुड़ भी गई हूँ आपके ब्लॉग से

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  8. सुन्दर भावों को समेटे हुए,ह्रदय तक दस्तक देती रचना !!!

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  9. सुन्दर भावों को समेटे हुए,ह्रदय तक दस्तक देती रचना !!!

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  10. बहुत सुंदर रचना !:)
    हर राही को पहुँचाता है मंज़िल पर... वो रास्ता...
    जिस रास्ते की खुद कोई मंज़िल ही नहीं होती ....
    ~सादर

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  11. अनुपम भाव संयोजित करते हुये उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

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  12. बहुत सुन्दरता से पिरोई हुई मैं की परिभाषा ..

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  13. बहुत प्यारी रचना है सुमन...
    बार बार पढ़ी...

    अनु

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  14. बहुत सुंदर भावों मे पिरोई गई रचना। लाजवाब अभिवयक्ति

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