शनिवार, 30 अगस्त 2014

तुम्हारी चाहना
















मैंने एक चाह भर की
कि आज रात तुम ना निकलो
मैं खुली खिड़की से निहारूं राह
पर तुम ना आओ
अजीब सी शै है तुम्हारी चाहना
एक अनबुझ प्यास |

बाहर बारिश की बूंदों ने
कुछ आस बंधाई है
आज रात तुम
बादलों के पीछे छिप जाना
धुल जाये जब सुबह तलक
कलंक का ठीका
मेरी खिड़की तले
बिखेर देना तुम हल्की चाँदनी |
***
कलंक चौथ एक आस्था ...गणेश चतुर्थी एक उत्सव ..सब मन का फेर है...तुम्हारी चाहना इससे इतर कुछ भी नहीं !!

सु-मन


29 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति ! भावपूर्ण शब्द

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 01/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  3. भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति |

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  4. मन के सुन्दर भावों को व्यक्त करती प्रभावी रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई

    आग्रह है --
    भीतर ही भीतर -------

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  5. हाँ एक कलंक लगने का दिन और वही गणपति के स्थापन का शुभ दिन। शायद हमारी मान्यताएं युग विरोधाभासी भी हैं।

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  6. कोमल भवसिक्त अति सुन्दर रचना....

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  7. बहुत कोमल माधुर्यसिक्त भावनाओं से पूर्ण - सुन्दर रचना !

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  8. बेहद खुबसूरत अभिव्यक्ति .... उम्दा रचना

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