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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

इंतज़ार नमी का...










शाम ढल चुकी है 
दूर पहाड़ के टीले पर 
कुछ तारों का जमघट 
देख रहा चाँद की राह 
मेरे हिस्से के आसमां  में 
है नमी सी 
भरी भरी नमी और खाली खाली आसमां 
चाँद को है इंतज़ार 
बदली हटने का 
और मुझे 
इंतज़ार नम होने का !!
***
एक हिस्से में सूखापन है बहुत 
कुछ नमी की तरावट लाज़मी है शायद !!


सु-मन  

15 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-02-2015) को "ब्लागर होने का प्रमाणपत्र" (चर्चा अंक-1896) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह सुमन जी ! बहुत सुन्दर ! यह नमी दिल तक पहुँच रही है !

    जवाब देंहटाएं
  3. आस्मां मे भी एक हिस्सा अपना ... बहुत खूब !!!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूब ... इंतज़ार सभी को है अपना अपना ... गहरा भाव लिए रचना ...

    जवाब देंहटाएं
  5. आज 26/फरवरी /2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  6. इंतज़ार

    कितनी मासूमियत है तेरे चेहरे पर
    बचपन के खेल की लकीरें चेहरे पर

    माँ के पल्लू में छुप जाता जब कभी तू
    आँगन की मिट्टी का तिलक है चेहरे पर

    बहन से लड़ाई करते कभी ज़िद्द करते
    उन्हीं के लिए उदासी लिपता चेहरे पर

    साथ रहकर कभी जिसे समझ न पाया था
    उसी का इंतज़ार करती झुर्रियाँ है चेहरे पर

    - पंकज त्रिवेदी

    http://shabdanagari.in/Website/Article/intazar

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  7. बहुत ही सुंदर और सार्थक रचना।

    जवाब देंहटाएं
  8. आपकी भावनायें एकदम नि:शब्द कर गयीं

    जवाब देंहटाएं

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