कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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शनिवार, 31 मार्च 2018
बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
बुधवार, 11 अक्टूबर 2017
बुधवार, 20 सितंबर 2017
आभासी दुनिया का साभासी सच
आभासी दुनिया का साभासी सच
जो दीखता है वो होता नहीं ,जो होता है वो दीखता नहीं..
आज बस में थोड़े कम लोग थे और मेरे सामने की सीट पर बैठी एक लड़की के हाथ में Mobile था । वो कुछ type कर रही थी माने chatting कर रही थी । न चाहकर भी मैं उस पर से अपना ध्यान हटा नही पाई । उसके होठों पर उभर आई मुस्कराहट उसकी आँखों में अजीब सी शोखी पैदा कर रही थी । मैं उसे देखती रही की इस आभासी दुनिया से मिली मुस्कराहट आभासी नहीं, साभासी थी (Realistic) थी । मैं उसके चहरे पर उभरते भावों को देखती रही कुछ भी तो आभासी नही था सब यथार्थ था उसकी मुस्कराहट ,उसके हाथ में वो mobile , उस पर टाइप करते उसके हाथ और उसको देखती हुई मैं .. सब यथार्थ, हकीकत हाँ आभासी था तो इंसान जिससे वो बात कर रही थी जो उस वक़्त न होकर भी इन सब में था /थी ।
आज मिली मुस्कराहट कल आंसू भी देगी , गम भी देगी । मिलता है दुख..तय है । सुख और दुख साथ साथ चलते हैं हमेशा । हर सुख आने वाले दुख के लिए नींव तैयार करता है और उसको भोगना पड़ता है क्यूंकि संवेदनाएं कभी आभासी नहीं होती वो यथार्थ से जुड़ी होती हैं । आभासी दुनिया ऐसी ही रहेगी कुछ भी न बदलेगा क्यूंकि नहीं देख पाता कोई तुम्हारे चेहरे पर उभरी मुस्कराहट या उदासी ,उसे तो दिखती है बस keypad पर लिखी एक इबारत जिसे पढ़कर या अनपढ़े वो बना देता है कोई स्माईली और इस तरह आपकी संवेदनाएं सिर्फ आभासी बन कर रह जाती हैं एक दिन किसी के लिए !!
(चार साल पहले ऑफिस जाती बार देखे दृश्य से प्रेरित )
सु-मन
बुधवार, 13 सितंबर 2017
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१३)
शाम खामोश होने को है और रात गुफ्तगू करने को आतुर ... इस छत पर काफी शामें ऐसी ही बीत जाती हैं ...आसमां को तकते हुए .... सामने पहाड़ी पर वो पेड़ आवाज लगाते हैं ..कुछ उड़ते परिदों को ..आओ ! बसेरा मिलेगा तुम्हें ..पर परिंदे उड़ जाते हैं दूर उस ओर ... अपने साथी संग .. सुनसान जंगल में रह जाती है पत्तों की चुप्पी ...।
आसमां तारों से भर चूका है ,सुबह की बदली का एक टुकड़ा बेतरतीब सा फैला छत पर कर रहा इन्तजार चाँद का ...।।
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-१२)
सोमवार, 14 अगस्त 2017
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
तुम और मैं
अनगिनत प्रयास के बाद भी
अब तक
'तुम' दूर हो
अछूती हो
और 'मैं'
हर अनचाहे से होकर गुजरता प्रारब्ध ।
एक दिन किसी उस पल
बिना प्रयास
'तुम' चली आओगी
मेरे पास
और बाँध दोगी
श्वास में एक गाँठ ।
तब तुम्हारे आलिंगन में
सो जाऊँगा 'मैं'
गहरी अनजगी नींद !
*****
उनींदी से भरा हूँ 'मैं' , नींदों से भरी हो 'तुम' ।
चली आओ कि दोनों इस भरेपन को अब खाली कर दें !!
सु-मन
सोमवार, 24 जुलाई 2017
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१२)
दोस्त वह जो जरूरत* पर काम आये ।
सोच में हूँ कि मैं / हम जरूरत का सामान हैं । जरूरत पड़ी तो उपयोग कर लिया नहीं तो याद भी नहीं आती । रख छोड़ते हैं मेरा / हमारा नाम स्टोर रूम की तरह मोबाइल की कोन्टक्ट लिस्ट में कोई जरूरत पड़ने तक !
फिर भी , मैं हूँ / हम हैं उम्र की आखिरी सतह तक एक दूसरे के लिए , गर समझ सको तो समझना !!
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-११)
गुरुवार, 13 जुलाई 2017
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (११)
सुबह और रात के बीच बाट जोहता एक खाली दिन ... इतना खाली कि बहुत कुछ समा लेने के बावजूद भी खाली .... कितने लम्हें ..कितने अहसास ...फिर भी खाली ... सूरज की तपिश से भी अतृप्त .. बस बीत जाना चाहता है | तलाश रहा कुछ ठहराव .. जहाँ कुछ पल ठहर सके ...अपने खालीपन को भर सके ।
ठहराव जरुरी है नव सृजन के लिए ...
इसलिए ऐ शाम !
रख रही हूँ एक और दिन तेरी दहलीज़ पर !!
रख रही हूँ एक और दिन तेरी दहलीज़ पर !!
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-१०)
गुरुवार, 29 जून 2017
हे निराकार !
तू ही प्रमाण , तू ही शाख
तू ही निर्वाण , तू ही राख
तू ही बरकत , तू ही जमाल
तू ही रहमत , तू ही मलाल
तू ही रहबर , तू ही प्रकाश
तू ही तरुबर , तू ही आकाश
तू ही जीवन , तू ही आस
तू ही सु-मन , तू ही विश्वास !!
*******
मन में विश्वास है और विश्वास में तुम
मेरे आकारित परिवेश के तुम एकमात्र प्रहरी हो ।
सु-मन
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