कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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बुधवार, 26 सितंबर 2018
शुक्रवार, 14 सितंबर 2018
जन्मदिवस हिंदी
जन्मदिवस मुबारक प्यारी हिंदी
हर रोज हम तुम्हारा उपयोग करें |
मिले तुम्हें नई पीढ़ी का साथ
तुम संग वो दोस्ती का आगाज़ करें |
चाहे घर हो या दफ़्तर, बाज़ार
हिंदी में सब पढ़ाई लिखाई करें |
गुड मॉर्निंग के बदले बोले सुप्रभात
हम सब ये आज से शुरुआत करें |
करके अपनी मातृभाषा का सम्मान
आओ ! हम इसका गुणगान करें |
सु-मन
गुरुवार, 6 सितंबर 2018
गुरुवार, 16 अगस्त 2018
और तुम जीत गए
पक्का निश्चय कर
साध कर अपना लक्ष्य
चले थे इस बार ये कदममंजिल की ओर
मन में विश्वास लिए
मान ईश्वर को पालनहार
कर दिया था अर्पित खुद को
उस दाता के द्वार
मेहनत का ध्येय लिए
कर दिए दिन रात एक
त्याग दिए थे हर सुख साधन
कर्म के इम्तिहान में
कभी किसी पल
तुम आकर मुझे डराते
तोड़ने लगते थे मेरा विश्वास
अपने दलीलों से
तब मैं -
मन में ऊर्जा सृजित कर
ख़ामोश कर देती थी तुमको
मेहनत और कर्म की प्रधानता से
बाद महीनों -
तुम फिर मेरे सामने हो
उन्हीं दलीलों के साथ
सशक्त, अडिग,ऊर्जावान
और मैं -
मेहनत के उड़ते रंग लिए
विश्वास की टूटी डोर पकड़े
ख़ामोश, मँझधार , ऊर्जाहीन ।
ऐ प्रारब्ध !
मान ईश्वर को पालनहार
कर दिया था अर्पित खुद को
उस दाता के द्वार
मेहनत का ध्येय लिए
कर दिए दिन रात एक
त्याग दिए थे हर सुख साधन
कर्म के इम्तिहान में
कभी किसी पल
तुम आकर मुझे डराते
तोड़ने लगते थे मेरा विश्वास
अपने दलीलों से
तब मैं -
मन में ऊर्जा सृजित कर
ख़ामोश कर देती थी तुमको
मेहनत और कर्म की प्रधानता से
बाद महीनों -
तुम फिर मेरे सामने हो
उन्हीं दलीलों के साथ
सशक्त, अडिग,ऊर्जावान
और मैं -
मेहनत के उड़ते रंग लिए
विश्वास की टूटी डोर पकड़े
ख़ामोश, मँझधार , ऊर्जाहीन ।
ऐ प्रारब्ध !
इम्तिहान में हारी मैं और तुम फिर जीत गए !!
सु-मन
सोमवार, 13 अगस्त 2018
शनिवार, 4 अगस्त 2018
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (१७)
..ज़ख्मों को कुरेदती हूँ
तो दर्द सकून देता है !!
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-१६)
शनिवार, 21 जुलाई 2018
शनिवार, 7 जुलाई 2018
रविवार, 24 जून 2018
जिंदगी
कौन ? अंदर से आवाज़
आई |
मैं \ बाहर से उत्तर
आया |
मैं !! मैं कौन ?
जिंदगी .... , उसने
जवाब दिया |
अच्छा ! किसकी ? \
अंदर से सवाल |
तुम्हारी \ भूल गई
मुझे ... | इसी बीच मन के अधखुले दरवाजे को लांघ कर उसने भीतर प्रवेश कर लिया |
मैं कभी किसी को
नहीं भूलती \ पर अकसर खुद को भूला देती हूँ दूसरों के लिए |
हाँ , मैं जानती हूँ
\ उसने कहा
कैसे ?
तुम्हारी जी हुई
जिंदगी हूँ ना , तुम्हें अच्छे से जानती हूँ | वो मुस्कराई |
ओह !! आज क्या जानने
आई हो | सवालों की तल्खी उदासी को खुद-ब-खुद बयाँ कर रही थी |
देखने आई हूँ कि तुम
ठीक हो या नहीं |
क्यूँ ? मुझे क्या
हुआ है |
ये तो सिर्फ तुम्हें
और मुझे मालूम है |
हम्म |
फिर आज रात फिर से
नहीं सोई होगी |
हाँ नहीं सोई \ तो ?
जवाब में सवाल की गूँज थी |
मुझे याद करती रही
ना \ सोचती रही हर उस पल के बारे में जिसमें हर साँस मौत से लड़ी थी तुम | भूल
क्यूँ नहीं जाती तुम ?
क्यूँ हर साल ये दिन
याद रखती हो ? जिंदगी बोले जा रही थी |
कैसे भूल जाऊं \
बोलो , कैसे भूल जाऊं | इस दिन का हर पल मेरे आँखों के सामने घूम रहा | जिंदगी और
मौत लड़ाई में जीया वो वक्त भूल जाऊं ? अंतर्मन फूट पड़ा |
उसे याद करके भी तो
उदास हो जाती हो तुम \ जिंदगी बोली |
तो तुम क्यूँ बार
बार मेरे मन में दस्तक देती हो \ तुम तो बीती जिंदगी हो ना \ जी लिया है तुमको ,
तुम्हारा काम खत्म \ तो क्यूँ बार बार मुझे तंग करती हो |
तुम बुलाती हो मुझे
\ जिंदगी बोली
मैं????
हाँ ! तुम....
सुनो ! इस दिन जिंदगी
और मौत की लड़ाई जीत कर तुम्हें नई जिंदगी मिली \ मौत की उस लड़ाई में तुमने जो सहन किया वो
तुम्हारी हिम्मत थी \ इस दिन को याद रखो ईश्वर को शुक्रिया करने के लिए कि तुमको
नई जिंदगी मिली |
मैं तो बीती जिंदगी
हूँ किसी भी कमजोर पल इंसान के मन के दरवाजे पर दस्तक दे देती हूँ | पर याद रखना कोई
भी दुख मन के गहरेपन से गहरा नहीं होता और हर सुख ताउम्र सकून नहीं देता | वर्तमान
में जीना सीखो \ इससे तुम भी खुश रहोगी और मैं भी |
अच्छा ! तुम कैसे ?
क्यूँ ? मुझे ब्रेक
नहीं चाहिए क्या ?
हर साल इस दिन मुझे
उदास होकर बुला लेती हो \ इतना डिस्टर्ब करती हो मुझे | जिंदगी बोली |
ओके \ अब नहीं
करूँगी
पक्का ??
हम्म ||
तो मैंने जाऊँ ?
हूँ जाओ |
अगली साल तो नहीं
बुलाओगी ?
हाँ !!
क्याssss \ जिंदगी पीछे मुड़कर बोली |
ईश्वर का शुक्रिया
करने के लिए – उसने उत्तर दिया |
वर्तमान में जीने के लिए खुशनुमा पल छोड़कर बीती जिंदगी मुस्कराहट
के साथ मन के दरवाजे के पार निकल गई |
( इस लघु कहानी में
पात्र को परिभाषित न करना ही उचित लगा सो नहीं किया | शायद ये हर इंसान के अंदर
छिपा पात्र है शायद इसलिए )
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