कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019
रविवार, 30 दिसंबर 2018
जब आता है दिसम्बर

लम्बी सर्द रात में
ऊँघता है चाँद तन्हा
जर्द पत्तों को संभाले
ओढ़ लेते है दरख्त
सफेद चादर
जब आता है दिसम्बर....
धूप की मिन्नतें करते
नज़र आते हैं सुबह
ओस के मेहमान
क्यारी के बेफूल पौधे
होते हैं कुछ उदास
जब आता है दिसम्बर....
मक्की की रोटी
चूल्हे पर है पकती
क्या खूब होता जायका
सरसों के साग का
मक्खन चुपड़ के
खिलाती है माँ
जब आता है दिसम्बर....
बीते ग्यारह मास
करता हर कोई याद
क्या खोया और पाया
होता ये एहसास
बीती को बिसार कर
बढ़ता नव वर्ष की ओर
जब आता है दिसम्बर.... !!
सु-मन
#बारह_मास_नवम्बर
शुक्रवार, 30 नवंबर 2018
मंगलवार, 27 नवंबर 2018
शनिवार, 24 नवंबर 2018
बुधवार, 26 सितंबर 2018
शुक्रवार, 14 सितंबर 2018
जन्मदिवस हिंदी
जन्मदिवस मुबारक प्यारी हिंदी
हर रोज हम तुम्हारा उपयोग करें |
मिले तुम्हें नई पीढ़ी का साथ
तुम संग वो दोस्ती का आगाज़ करें |
चाहे घर हो या दफ़्तर, बाज़ार
हिंदी में सब पढ़ाई लिखाई करें |
गुड मॉर्निंग के बदले बोले सुप्रभात
हम सब ये आज से शुरुआत करें |
करके अपनी मातृभाषा का सम्मान
आओ ! हम इसका गुणगान करें |
सु-मन
गुरुवार, 6 सितंबर 2018
गुरुवार, 16 अगस्त 2018
और तुम जीत गए
पक्का निश्चय कर
साध कर अपना लक्ष्य
चले थे इस बार ये कदममंजिल की ओर
मन में विश्वास लिए
मान ईश्वर को पालनहार
कर दिया था अर्पित खुद को
उस दाता के द्वार
मेहनत का ध्येय लिए
कर दिए दिन रात एक
त्याग दिए थे हर सुख साधन
कर्म के इम्तिहान में
कभी किसी पल
तुम आकर मुझे डराते
तोड़ने लगते थे मेरा विश्वास
अपने दलीलों से
तब मैं -
मन में ऊर्जा सृजित कर
ख़ामोश कर देती थी तुमको
मेहनत और कर्म की प्रधानता से
बाद महीनों -
तुम फिर मेरे सामने हो
उन्हीं दलीलों के साथ
सशक्त, अडिग,ऊर्जावान
और मैं -
मेहनत के उड़ते रंग लिए
विश्वास की टूटी डोर पकड़े
ख़ामोश, मँझधार , ऊर्जाहीन ।
ऐ प्रारब्ध !
मान ईश्वर को पालनहार
कर दिया था अर्पित खुद को
उस दाता के द्वार
मेहनत का ध्येय लिए
कर दिए दिन रात एक
त्याग दिए थे हर सुख साधन
कर्म के इम्तिहान में
कभी किसी पल
तुम आकर मुझे डराते
तोड़ने लगते थे मेरा विश्वास
अपने दलीलों से
तब मैं -
मन में ऊर्जा सृजित कर
ख़ामोश कर देती थी तुमको
मेहनत और कर्म की प्रधानता से
बाद महीनों -
तुम फिर मेरे सामने हो
उन्हीं दलीलों के साथ
सशक्त, अडिग,ऊर्जावान
और मैं -
मेहनत के उड़ते रंग लिए
विश्वास की टूटी डोर पकड़े
ख़ामोश, मँझधार , ऊर्जाहीन ।
ऐ प्रारब्ध !
इम्तिहान में हारी मैं और तुम फिर जीत गए !!
सु-मन
सोमवार, 13 अगस्त 2018
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