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रविवार, 17 जून 2012

ऐ बाबुल


















बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही  
मत तोड़ मुझे डाली से
खिलने दे अपनी बगिया ही …….

बेटा बनकर तुझको संभालूं
बुढ़ापे का बनूँगी सहारा भी
कभी न छोडूंगी तेरा दामन
आँखें बन करुँगी उजियारा भी

बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही......

रिश्ते जहाँ में झूठे हैं सारे
नहीं और रिश्ता तुझसा कोई
क्यूँ कहें दुनिया मोहे ऐ बाबुल
बेटी जैसा बोझ ना दूजा कोई

बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही.....

माँ की लोरी याद है आती
वो मुझको सहलाती बाहें तेरी
पुकारे मुझको घर का आँगन
ये महकती हुई फुलवारी तेरी

बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही.......

बचपन में तूने थामा हाथ मेरा
अब तुझको ना गिरने दूंगी कभी
समय को बदलने दे अपने तेवर
तू डर मत मैं न बदलूंगी कभी

बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही.....

कभी ना भटकूंगी कर्म पथ पर
हर मुश्किल से लड़ लूंगी मैं भी
आशीष तेरा रहे सदा मुझ पर  
बस इतना कर्म करना तू भी


बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही
मत तोड़ मुझे डाली से
खिलने दे अपनी बगिया ही........!!




                                     


  सु ..मन 

रविवार, 10 जून 2012

एक क्षण ठहर कर

14 अप्रेल 1984 में वीर प्रताप अखबार में प्रकाशित मॉम की कविता














मुझे याद है
जब भी वहाँ
‘उस’ खिडकी से
झाँका करती थी
देखा करती थी मैं
दूर गगन में
ऊन के फाहों की तरह
तैरते
श्वेत – श्याम
बादलों को
सरोवर में खिले
कमल-दलों को |
तब मेरा भी
मन करता था
समीर संग चल दूँ
चल कर
घन-मंडलों में
जल-कण बन
छिप जाऊं
सरसता में सरसाऊं
प्यासी धरा को |
सुगंध सदृश
बस जाऊं सुमन में
खिल जाऊं
जन-जन की मन बगिया में
गुलपकावली के
नव-पुष्पित फूलों की तरह |
लेकिन यहाँ
‘इस’ खिडकी को खोलते ही
सामने आये
भयंकर तूफ़ान
घोर घन-गर्जना
कड़कती बिजली,
महसूस हुआ एक धमाका
अपने भीतर
और अनजाने ही
अजनबी भय से कांपते
हाथों ने मानो 
खिडकी बंद कर दी
सदा के लिए अब
अक्सर
सोचती हूँ
मिटा दूँ खुद अपनी हस्ती
न काँटों की चुभन हो
न फूलों सी आह |
लेकिन तभी
‘एक क्षण’
ठहर कर पूछता है मुझसे
क्या
उचित होगा यह
तुम्हारे लिए ?




दमयंती कपूर 





शुक्रवार, 8 जून 2012

मन बावरा




















मन बावरा
उड़ने चला
पंख बिना


टूटे पंख
छूटे सपने
बादल बरसे


कलम भीगी
लफ्ज़ पनपे
नज्म उभरी !!









सु-मन 



रविवार, 13 मई 2012

दर्द





















दर्द अब पत्थर हो गया है
आँखें वीरान पथरीली जमीन

अहसास इकहरे ही घूमते रहते हैं
इस छोर से उस छोर
अपने अस्तित्व की तलाश में...

लहू तेजाब सा रगों में बावस्ता है
दिल झुलस रहा आहिस्ता-आहिस्ता
जख्म से नासूर बनने तक...

जाने कितनी साँस बाकी है अभी
जाने और कितना दर्द पत्थर होने को है...!!  




सु-मन



मंगलवार, 1 मई 2012

इंसान ओढ़े है नकाब
















आज चारों ओर
देखने को मिलते हैं
नकाब ओढ़े इंसान |

अक्सर 
फाईलों के ढेर में
अपने सर को छुपाए
दिखाई देते हैं जो
निर्बल असहाय से
काम के बोझ तले दबे |

पर स्वत: ही
बदल जाता है
उनका स्वरूप
ज्यूँ ही
मेज के नीचे से
सुनाई देने लगती है
उनको
हरे कागजों की सरसराहट |

तब
बदल जाता है
उनका चेहरा
और ओढ़ लेता है
इक नकाब
आँखों में
आ जाती है
एक चमक
धीरे –धीरे
खिसकने लगता है
उनके मेज पर से
फाईलों का ढेर...!!


सु-मन  

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

सीले से लफ्ज़























यूँ ही दरवाजे पे  दी दस्तक

कुछ बीते लम्हों ने

खोला .....तो देखा

कुछ सीले सीले से लफ्ज़

मेहमां बनकर

खड़े हैं सामने मेरे

समेट कर हथेली पर

ले आई मैं उनको अन्दर

यादों के सरहाने रख दिया है अब उनको भी.......!!


सु-मन 

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

घर के आँगन में


घर के आँगन में
नहीं खिलते अब
कोई भी फूल
न ही लगते हैं
कोई बेल बूटे

हवाएं भी उधर से होकर
गुजर जाती हैं
उस मोड़ से मुड़ कर
चली जाती हैं अब तो
पसरी रहती है उमस सी
हर वक़्त-हर घड़ी
जो लील लेती है
बची नमी को भी

वो उधर उस कोने में
हुआ करता था इक पेड़
रहता था जिसमें
एक जोड़ा पंछी का
गुनगुनाता था मेरा आंगन
उनकी प्यार की सरगम से
बिखरी रहती थी ज्यूँ
एक महक सी चहुँ ओर

अब तो रह गया है
सूखा सा तना ही उसका
नहीं उगते हैं जिस पर
अब कोई भी पत्ते
टहनियां भी कभी की
गिर चुकी हैं टूट के

अधटूटे पोखर के
अधबुने से आशियाने में
वो रहती है अब तन्हा
निहारा करती है राह
अपने बिछड़े साथी की
जो आने का बहलावा देकर
न जाने कहाँ उड़ गया

आँगन में अब
नहीं गूंजती सगरम
बस सुनाई देती है
उसकी आहें
कैसे समझाउं मैं
उस नादाँ जान को
जाने वाला नहीं आता
वापिस लौट के
उसके आंसुओं से
हो गई है रुआंसी सी
अब तो
क्यारी की मिट्टी भी
तब से...
घर के आँगन में
नहीं खिलते हैं अब
कोई भी फूल
न ही लगते हैं
कोई बेल बूटे.......!!

सु-मन

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

वटवृक्ष पत्रिका पर प्रकाशित मेरी रचना

मैं आभारी हूँ रविन्द्र प्रभात जी और वटवृक्ष की पूरी टीम की जिन्होंने मेरी रचना को पत्रिका में स्थान दिया .....
तेरा अहसास मन मेरे

तेरा अहसास मन मेरे
मेरे वजूद को
सम्पूर्ण बना देता है
और मैं
उस अहसास के
दायरे में सिमटी
बेतस लता सी
लिपट जाती हूँ
तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से
तब मेरा वजूद
पा लेता है
एक नया स्वरूप
उस तरंग सा
जो उभर आती है
शांत जल में
सूर्य की पहली किरण से
झिलमिलाती है ज्यूँ
हरी दूब में
ओस की नन्ही बूंद
तेरी वो खुली बाहें
मुझे समा लेती हैं
जब अपने आगोश में
तो मन मेरे
मेरा होना
सार्थक हो जाता है
मेरा अस्तित्व
पूर्णता पा जाता है
और उस समर्पण से
अभिभूत हो
मेरी रूह के जर्रे जर्रे से
तेरी खुशबू आने लगती है
महक जाता है
मेरा रोम रोम
पुलकित हो उठता है
एक सुमन सा
तेरे अहसास का
ये दायरा
पहचान करा देता है
मेरी , मेरे वजूद से
और मेरे शब्दों को
आकार दे देता है
मेरी कल्पना को
मूरत दे देता है
मैं उड़ने लगती हूँ
स्वछ्न्द गगन में
उन्मुक्त तुम संग
निर्भीक ,निडर
उस पंछी समान
जिसकी उड़ान में
कोई बन्धन नहीं
बस हर तरफ
राहें ही राहें हों
मन मेरे
तेरा ये अहसास
मुझे खुद से मिला देता है
मुझे जीना सिखा देता है
मन मेरे.....
मन मेरे...... !!
                                      सु-मन 

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

कैद-ए-रिहाई


               

                 जिंदगी उलझने लगी है, सब्र टूटने लगा है
                 खुद की आजमाइश में, दिल डूबने लगा है ।

                 वक़्त के पहलू में , जाकर हमने देखा
                 ये रेत की तरह, हाथों से फिसलने लगा है ।


                 विचारों की जुम्बिश में, भटकता हुआ मन
                 कैद-ए-रिहाई को , अब तड़पने लगा है ।


                                     


                                                            सुमन




गुरुवार, 21 जुलाई 2011

काश ऐसा होता…....



काश ऐसा होता

      उड़ सकती मैं भी
  
      खुले आसमां में

     पंछियों की तरह

बादलों के संग

        धीरे धीरे विचरती
  
               काश ऐसा होता.........

       चल सकती मैं भी

    हवा के साथ साथ

 गुनगुनाती हुई

        रागिनी की तरह

               काश ऐसा होता..........

        पहुंच जाती मैं भी

      तारों के गुलिस्ताँ में

 चाँद के संग

           चाँदनी की तरह

           इठलाती हुई

               निशा के संग

             धीरे-धीरे विचरती


            काश ऐसा होता.......

       काश ऐसा होता.......
          

                                                                                 सु..मन 

   
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