खींची आज जिसने लक्ष्मण रेखा घर के दरवाजे पर सबके हित के लिए वो खुद बेमिसाल बन गए लाँघ गए जो अपनी जिद की खातिर कुछ कदम न जाने कितनी जिंदगियों का आखिरी काल बन गए !!
होकर तेरा हिस्सा भी, तुझसे अलग सा था मैं आतंक के साये में, खुद अपनों से डरता था मैं चाह थी, हर जँजीर हट जाए फर्क और मज़हब की इसी आज़ादी के तिरंगे की, अभिलाषा करता था मैं !!
मन ! खुशी मुबारक | 1st अगस्त को iblogger द्वारा आयोजित Blogger of the Year 2019 Contest के परिणाम की घोषणा की गई और Top 10 blogger of the year में अपना नाम दिखा तो मन खुश हो गया | सोचा आप सब से अपनी खुशी साझा कर लूँ , उन पाठकों से जिन्होंने मेरे लेखन को सराहा.. मेरे लफ्ज़ों को गति दी | विजेता , उपविजेता और सभी विजेताओं को शुभकामनाएं .... निर्णायक मण्डल और पाठकों का तहे दिल से शुक्रिया .. और मन ! मेरे हर लफ्ज़ , विचार और अभिव्यक्ति के रचयिता ..तुझे प्यार भरी झप्पी :-) सु-मन
इस दफ़ा शब्दों के मानी बदल गए नहीं उतरे कागज़ पर , तकल्लुफ़ करते रहे वक़्त के हाशिये पर देता रहा दस्तक अनचिन्हा कोई प्रश्न, उत्तर की तलाश में कागज़ फड़फड़ाता रहा देर तक बाद उसके, थोड़ा फट कर चुप हो गया आठ पहरों में बँटकर चूर हुआ दिन टोहता अपना ही कुछ हिस्सा वजूद की तलाश में एक सिरकटी याद का ज़िस्म जलता रहा सोच के दावानल में धुआँ धुआँ जिंदगी दूर बैठ उसे ताकती रही, अपलक सुलगती रही बिन आग, याद के साथ साथ !! दरअसल - वक़्त दिन तारीख नहीं होते एक दूसरे से जुदा शब्द ढूँढ ही लेते रास्ता कागज़ पर उतरने का यादें कभी बंजर नहीं होती जिंदगी के रेगिस्तान में !! सु-मन
चुरा लाई हूँ तुम्हें तुम्हारे दरख़्त से रख दिया है सहेज के अपनी नज़्मों के पास बहुत ख़्वाहिश थी बिताऊँ चन्द लम्हें तुम्हारे आगोश में डल के किनारे बैठ करूँ हर शाख से बातें महसूस करूँ तुम्हारा वजूद उतार लूँ तुमको मन के दर्पण में ये सोच- ले आई तुम्हें अपने साथ कि मेरी हर नज़्म अब बर्ग-ए-चिनार होगी ।।