सोमवार, 29 नवंबर 2010

इक क़तरा जिंदगी का................





















मैनें बोया था एक बीज तेरी याद का
कुछ दिन हुए एक कांटा उभर आया है

उससे जख़्म-ए-दिल को सिल रही हूँ ।

                                                                                  सु..मन 

22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !!
    क्या बात ! क्या बात ! क्या बात !

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  2. गजब कि पंक्तियाँ हैं
    ........बहुत पसन्द आया

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  3. मैनें बोया था एक बीज तेरी याद का
    कुछ दिन हुए एक कांटा उभर आया है
    उससे जख़्म-ए-दिल को सिल रही हूँ ।
    बिल्कुल अलग सा खूबसूरत अंदाज़...
    मेरा एक शेर मुलाहिज़ा फ़रमाएं-
    जिसकी फ़ुरक़त ने बढाया है मेरी मुश्किल को
    उसकी यादों ने ही आसान बना रखा है.

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  4. वाह, आपने चंद शब्दों में दर्द की गहराइयाँ नाप ली

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  5. ज़ख्म - ए - दिल को सीने के लिए भी धागे की ज़रूरत होती है ..

    बहुत खूबसूरत लिखा है ...

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  6. अरुणा जी गागर मे सागर? वाह । शुभकामनायें।

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  7. ला-अलफ़ाज़ हूँ. कुछ सूझ नहीं रहा कहने को.

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  8. आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया............

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  9. निर्मला कपिला जी ये अरुणा जी का नहीं मेरा ब्लॉग है............

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  10. बहुत खूब ... शायद वो दर्द का बीज होगा ... जो काँटा उगा गया ...

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  11. वाह जी वाह क्या बात है आपके लेखन में

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  12. एक खूब सुरत एहसास ....बहुत सुन्दर ..!!

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