सोमवार, 7 मार्च 2011

अस्तित्व

नारी दिवस पर मेरी एक पुरानी कविता .....
      
 अस्तित्व



दी मैनें दस्तक जब इस जहाँ में

कई ख्वाइशें पलती थी मन के गावं में

सोचा था कुछ करके जाऊंगी

जहाँ को कुछ बनकर दिखलाऊंगी

बचपन बदला जवानी ने ली अंगड़ाई

जिन्दगी ने तब अपनी तस्वीर दिखाई

मन पर पड़ने लगी अब बेड़ियां

रिश्तों में होने लगी अठखेलियां

जुड़ गए कुछ नव बन्धन

मन करता रहा स्पन्दन

बनी पत्नि बहू और माँ

अर्पित कर दिया अपना जहाँ

भूली अपने अस्तित्व की चाह

कर्तव्य की पकड़ ली राह

रिश्तों की ये भूल भूलैया

बनती रही सबकी खेवैया

फिसलता रहा वक्त का पैमाना

न रुका कोई चलता रहा जमाना

चलती रही जिन्दगी नए पग

पकने लगी स्याही केशों की अब

हर रिश्ते में आ गई है दूरी

जीना बन गया है मजबूरी

भूले बच्चे भूल गई दुनियां

अब मैं हूँ और मन की गलियां

काश मैनें खुद से भी रिश्ता निभाया होता

रिश्तों संग अपना अस्तित्व भी बचाया होता.................
                                                        

                                      

                                                                                        सु..मन 

20 टिप्‍पणियां:

  1. सुमन मीत जी!
    आपने बहुत सुन्दर और सशक्त रचना लिखी है!
    महिला दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
    --
    केशर-क्यारी को सदा, स्नेह सुधा से सींच।
    पुरुष न होता उच्च है, नारि न होती नीच।।
    नारि न होती नीच, पुरुष की खान यही है।
    है विडम्बना फिर भी इसका मान नहीं है।।
    कह ‘मयंक’ असहाय, नारि अबला-दुखियारी।
    बिना स्नेह के सूख रही यह केशर-क्यारी।।

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  2. स्त्री जीवन का सच्चा खाका खींचा है आपने अपनी इस रचना में...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  3. नारी के अस्तित्व विवेचन का अति उत्तम चित्रण
    बधाइयाँ..

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  4. बचाने में न जाने कितना चला जाता है, प्रवाह में भी माणिक मिल जाते हैं।

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  5. अस्तित्व के बिना भी क्या जीना।
    बिन आत्म सम्मान के जीना गया फिज़ूल
    उस जीवन को क्या कहें जिसमे नहीं उसूल
    शुभकामनायें।

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  6. बहुत खूब ... खुद का असतित्व जरूर बचाए रखना चाहिए ... अच्छी रचना है ...

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  7. You write so well and so beautifully that many a time I think how could u write that way.Your post is always a real treat to my perception. In the present post U have brilliantly squeezed out your life.

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  8. man ki baat ekdam bebaki ke saath kavita men rakhi hai aapne......achchi lagi.

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  9. नारी के जीवन का चित्रांकन करती हुई एक बेजोड़ कविता...........बहुत सुन्दर लिखा है हर बार की तरह........

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  10. वाह बेहतरीन रचना.. यह केवल महिलाओं को ही नहीं पर हर इंसान को समझने की ज़रूरत है कि दुनिया की चकाचौंध में अपने अस्तित्व को न भूलें..
    अच्छा सन्देश..

    आभार
    चलती दुनिया पर आपके विचारों का इंतज़ार है

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  11. सुन्दर संवेदनशील रचना !
    आपको और आपके परिवार को होली की शुभकामनायें !

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