शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

इक उदास नज़्म











शाम की दहलीज पर
जब उदासी देती है दस्तक
खाली जाम लेकर
दौड़ आते हैं
कुछ लफ्ज़ मेरी ओर
भर देती हूँ
कुछ बेहिसाब से पल
छलकने लगता है भरा जाम
लेती हूँ एक घूँट
गहरी हो जाती है उदासी
बिखर जाते हैं लफ्ज़
बन जाती है
इक उदास नज़्म ....!!


सु..मन 

22 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. कुछ ऐसा ही है वंदना दी ....दर्द का प्याला

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (06-10-2013) हे दुर्गा माता: चर्चा मंच-1390 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. नवरात्रि की शुभकामनायें-
    सुन्दर प्रस्तुति है आदरणीया

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  4. प्रभावी !!!
    नवरात्रि की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं.

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  5. हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल परिवार की ओर से नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    --
    सादर...!
    ललित चाहार

    हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल पर आज की चर्चा : इक नई दुनिया बनानी है अभी -- हिन्दी ब्लागर्स चौपाल चर्चा : अंक 018

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  6. सुमन जी..सच कहूं...दर्द से लबरेज कविता को पढ़ने से बचता हूं..या कहिए कि भागता हूं..पर मन का क्या किया जाए...सच में बावरा है मन...और ये दर्द भी मजे लेने लगा है हमसे....अब तो जब भी याद आता है तो कहीं अंदर दर्द तो चेहरे पर मुस्कान भी दे जाता है...है न मजेदार चीज

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  7. उदास नज़्म दूर करती है उदासी के सबब.......
    शुभकामनायें!

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  8. मन दुख में गहराये, तो तलहटी में बैठकर नदी का प्रवाह देखना चाहिये।

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  9. हाहा, :) बेचैन ये यादें करती है..
    और मुश्किल, जिंदगी हो जाती है..

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