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शनिवार, 20 दिसंबर 2014

ये कैसा है ज़ेहाद














ये कैसा है ज़ेहाद
कैसा सकूँ-ए-रूह है
खाक करना अमन-ओ-वतन
किस मजहब का असूल है

ये कैसी है सरहद
कैसी मजहबी तलवार है
उजाड़ देना माँ की कोख़
किस इबादत का यलगार है

ये कैसा है जुनून
कैसा क़त्ल-ए-आम है
छीन लेना लख्त-ए-ज़िगर
किस अल्लाह का पैगाम है

ये कैसा है करम..तेरा मौला
कैसा रहमत का तूफान है
आँगन बना उजड़ा चमन
हर घर तब्दील कब्रिस्तान है
हर घर तब्दील कब्रिस्तान है....!!



सु-मन 

15 टिप्‍पणियां:

  1. धरती के कलंक हैं ये आतंकी इनका कोई न अल्लाह है न धर्म ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-12-2014) को "बिलखता बचपन...उलझते सपने" (चर्चा-1834) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ये सिर्फ दहशतगर्द हैं ... मानवता को शर्मसार किया है इन्होने ...

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  4. दुखद और कायरता भरे इस कृत्य के लिए सुमन जी अगर सही कहा जाए तो पाकिस्तान ही है ! लेकिन विडम्बना ये वहां के सियासतदानों की कारगुजारियों का सिला वहां के बच्चों और वहां की अवाम को चुकाना पड़ रहा है !!

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  5. सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  6. ये कैसी धार्मिक अंधभक्ति है इंसानो को मरकर खुद को बचाना चाहते है। बेहतरीन।

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  7. संवेदनशील। नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ, सादर।

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  8. मार्मिक रचना, नये वर्ष की शुभकामनायें !

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  9. इस रचना की जितनी तारीफ की जाए कम है। आजकल जो कुछ हो रहा है। वह जेहाद नहीं है। जेहाद एक उद्धोग बन चुका है। जहां लोग पैसा पाकर कत्‍ल करने का काम करते हैं। पहले लादेन इस इण्‍डस्‍ट्री का बिल गेटस था। अब यह जगह बगदादी ने ले ली है।

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  10. बहुत सुन्दर सार्थक सृजन, बधाई

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