@सर्वाधिकार सुरक्षित

सर्वाधिकार सुरक्षित @इस ब्लॉग पर प्रकाशित हर रचना के अधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं |

शनिवार, 28 अगस्त 2021

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (२२)

                                               
                            पवित्रता और अपवित्रता मन की होती है तन की नहीं । चाहे कितनी भी पूजा अर्चना कर लो, मन्दिर के फेरे लगा लो, मन अपवित्र तो तन से की पूजा का कोई महत्व नहीं । अगर मन पवित्र तो तन की अपवित्रता गौण हो जाती है वो अपवित्रता जो मनुष्य द्वारा रचित है । उपासनाओं का मार्ग मन से होकर निकले तो निश्छल होता है और तन में ही रुक जाए तो छलावा ।

सु-मन 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर तथा प्रेरक कथन । बहुत शुभाकामनाएं आपको सुमन जी ।

    जवाब देंहटाएं
  2. गहनतम भाव ,सटीक विवेचना, तन और मन की पवित्रता का भेद बहुत सुंदर से बताया आपने।

    जवाब देंहटाएं
  3. उम्मीद करते हैं आप अच्छे होंगे

    हमारी नयी पोर्टल Pub Dials में आपका स्वागत हैं
    आप इसमें अपनी प्रोफाइल बना के अपनी कविता , कहानी प्रकाशित कर सकते हैं, फ्रेंड बना सकते हैं, एक दूसरे की पोस्ट पे कमेंट भी कर सकते हैं,
    Create your profile now : Pub Dials

    जवाब देंहटाएं
  4. ये भाव ही पवित्रता की ओर अग्रसर करता है। काश , अधिसंख्य इसे समझ नही पाते।

    जवाब देंहटाएं

www.hamarivani.com
CG Blog www.blogvarta.com blogavli
CG Blog iBlogger