कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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शुक्रवार, 4 जुलाई 2014
मंगलवार, 24 जून 2014
दुख - सुख
बीत जाने पर
नहीं रहता दुख , दुख सा
मिटटी हो जाता है
उपजाऊपन से भरा
जिसमें रोपा जाता है
सुख का बीज |
जानते हो !
कैसे ?
ज्यूँ डाली टूट जाने पर
नहीं रहता जब उसका वजूद
पत्ते सूखकर
बिखर जाते हैं राह पर
तब उस राह से गुजरते हुए
समेट लेता है उनको कोई
जला लेता है अलाव
तो जानते हो
उन पत्तों की टूटन का दर्द
दवा बन जाता है
डाली से बिछोह का दुख
तब दुख नहीं रहता
अलाव में जलकर भस्म हो जाता है
होती है उसे सुख की अनुभूति
राख हो जाने के बाद |
दरअसल
हर दुख के धरातल पर
पड़ती है आने वाले सुख की नींव
और
हर सुख के बिछोने पर
जन्मता है आने वाले सुख का अंश !!
*************
सु..मन
( एक दर्द की याद में ...एक बरस बीत जाने पर )
शुक्रवार, 6 जून 2014
ये एक गरम दिन था
जिसमें
सूरज ने उड़ेल दिया
अपना
सम्पूर्ण प्रेम
और
धरा
उस
प्रेम में तप कर
निर्वाक
जलाती रही खुद को
आँख
मिचे |
ये
एक गरम दिन था
जिसमें
नदी खुद पीती रही
अपना
पानी
किनारे
की रेत
प्रेम
की प्यास में जलकर
अतृप्त
शिलाओं के बाहुपाश में
देखते
रही इकहरी होती नदी को
टकटकी
लगाए |
ये
एक गरम दिन था
जिसमें
हरे वृक्ष पड़े थे
औंधे
मुँह
मक्की
बीजे खलिहानों में
अंकुर
ले रहा था
नवजीवन
की अनमोल साँसें
पवन
चक्की मांग रही थी
हिमालय
से अपने हिस्से की
कुछ
हवा |
ये
एक गरम दिन था
जिसमें
जीवन था..अनगिनत
साँसें थी !!
सु..मन
सोमवार, 2 जून 2014
रविवार, 13 अप्रैल 2014
जीना भर शेष ...
जीने के लिए
खाया भी पीया भी
भोगा भी खोया भी
किये अनेक तप चाहा मनचाहा फल
बजती रही मंदिर की घंटियाँ
जलता रहा आस्था की डोर का दीपक
मरने से पहले बुझी नहीं आस की लौ |
बीच सफ़र
डगमगाए कदम बहुत बार
बढ़ा भी रुका भी
गिरा भी संभला भी
बीने कंकर चल दिया राह पर अनथक
चलती रही आंधियाँ
बरसे बहुत गम के बादल
राह का धुंधलका घुलता रहा मंजिल पाने तक |
हर पल हर घड़ी
आती जाती रही बेआवाज़ साँसें
धड़का भी थमा भी
जीया भी मरा भी
मुखरित हुआ मौन बढ़ती रही जिंदगी
बदलते रहे पहर
लिखी जाती रही इबारत वक़्त के पन्ने पर
होती रही भोर काली रात बीत जाने के बाद |
******
(अब तक जो जीया हाथ की लकीरों में था ...लकीरों में थी जिंदगी ....जिंदगी में बहुत कुछ था पर कुछ भी नहीं ....उस कुछ की तलाश में है अभी जीना भर शेष ...मेरे लिए !!)
सु..मन
शनिवार, 15 मार्च 2014
प्रेम रंग
सुनो !
होली आने वाली है
और
तुमने पूछा है मुझसे
मेरा प्रिय रंग
चाहते हो रंगना मुझे
उस रंग से ...
जानते हो !
कौन सा रंग प्रिय है मुझे
वो रंग जो कभी ना छूटे
रहे संग मेरे हमेशा
जो ज़िस्म ही नहीं
रंग दे मेरी रूह को भी ...
तो सुनो !
यूँ करो न लाओ कोई रंग
बस अपनी आँखों में
देखने दो मुझे मेरी छवि
सुनने दो तुम्हारी धड़कन का साज़
मन की बाँसुरी पर बजाओ
मेरे लिए एक नव गीत
कि राधा बन रंग जाऊँ
तुम्हारे रंग में
लाल, पीला, हरा, गुलाबी
समाहित हैं जिसमें सब रंग
प्रेम रंग.. प्रेम रंग... प्रेम रंग !!
** जय राधे कृष्णा **
सु..मन
सभी को होली की शुभकामनायें
शुक्रवार, 7 मार्च 2014
वक्त की तासीर
दिन गरम है अब
और रातें ठण्डी
सुना है -
सूरज को लग गया है
मुहब्बत का रोग
सुलगने लगा है दिन भर
शाम की माँग में
टपकने लगा है
उमस का सिन्धूर
आसमां रहने लगा है ख़ामोश
रात कहरा कर
ढक लेती है
ओस का आँचल
चाँद भटकता है तन्हा रातभर
****************
बदल रहा है मौसम शायद
वक्त के बयार की तासीर बदल रही है !!
सु-मन
बुधवार, 29 जनवरी 2014
बता मन मेरे..गीत लिखूँ कौन सा !
शब्द सारे खो गए
छा गया है मौन सा
अब तू बता मन मेरे
गीत लिखूँ कौन सा ।
शब्द सागर है भरा
साहिल है बेचैन सा
अब तू बता मन मेरे
मोती चुनूँ कौन सा ।
ज्वलंत हैं अभिलाषाएँ
अस्तित्व है गौण सा
अब तू बता मन मेरे
रास्ता बढूँ कौन सा ।
नेह हृदय है बह रहा
माझी है निष्प्राण सा
अब तू बता मन मेरे
पतवार ढूँढू कौन सा ।
अब तू बता मन मेरे
गीत लिखूँ कौन सा ....!!
सु..मन
रविवार, 12 जनवरी 2014
माँ सुनो !
(बेटी दिवस पर)
माँ सुनो !
जब पहली बार
किया था महसूस
अपने गर्भ में
मेरा वजूद
तो बताओ ना
मेरी धड़कन में
किसे जिया था तुमने
एक बेटा या बेटी ।
जब कभी
अकेले में बैठ
करती थी मुझसे बात
क्या कुछ पनपता था
तुम्हारे भीतर
एक बेटी की चाह
या बेटे का सपना ।
जब पहली बार
गूँजी मेरी किलकारी
लिया था अपने हाथों में
तुम्हारी सोच की हकीकत को
बताओ ना
कैसे स्वीकारा था तुमने ।
.
.
.
तुम मौन हो माँ
जानती हूँ तुम्हारी चुप्पी
इतने बरस
बेटी के वजूद को
महसूस करती आई हूँ
तुमसे होकर गुजरती
तय कर रही हूँ
तुम्हारे गर्भ से इस घर तक सफ़र !!
तुम्हारी बेटी
सु..मन
शनिवार, 23 नवंबर 2013
जिजीविषा
गूंजने लगे हैं
फिर वही सन्नाटे
जिन्हें छोड़ आए थे
दूर कहीं ... बहुत दूर
तकने लगी हैं
फिर वही राहें
जो छूट गई थी
पीछे ... बहुत पीछे |
ख़याल मन में नहीं बसते अब
बस इसे छूकर निकल जाते हैं
‘बावरा मन’ समझ गया है
ख़याल मेहमान है
आये, आकर चले गए
हकीकत साथी है
चलेगी दूर तलक |
ये दो नयन भी नहीं छलकते अब
सेहरा बन गए हैं शायद
जिनमें उग आए हैं
कुछ यादों के कैक्टस
जिनके काँटों की चुभन से
कभी निकल आते हैं
अश्क के कतरे
जज़्ब हों जाते हैं
लबों तक आते आते |
घर में भी इंसान नहीं रहते अब
बस घूमती हैं चलती फिरती लाशें
नहीं पकती चूल्हे पर रोटी
खाली बर्तन को सेंकते
लकड़ी के अधजले टुकड़े
बिखेरते रहते हैं धुआं
तर कर देते हैं
ये शुष्क आँखें |
कुछ इस तरह
जिंदगी को मिल जाती है
टुकड़ों –
टुकड़ों में
जीने के लिए
जिजीविषा !!
सु..मन
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