कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
Pages
@सर्वाधिकार सुरक्षित
सर्वाधिकार सुरक्षित @इस ब्लॉग पर प्रकाशित हर रचना के अधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं |
गुरुवार, 27 जनवरी 2011
रविवार, 16 जनवरी 2011
मेरी कौन हो तुम !........ब्लॉग की पहली सालगिरह
आज बावरा मन को शूरू किए एक वर्ष हो गया और इस समय में बहुत कुछ पाया मैनें आप सभी से.....स्नेह , सुझाव और सबसे बड़ी बात आप सभी का साथ । कवि या लेखक का लिखना तब सार्थक हो जाता है जब उसकी लेखनी से उसके दिल की बात दूसरे तक पहुँच जाती है।आज ब्लॉग की पहली सालगिरह पर ये कविता आप सभी के सामने रख रही हूँ जो मेरे दिल बहुत करीब है.......
मेरी कौन हो तुम !
पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !
मैं पथिक तुम राह
मैं तरु तुम छाँव
मैं रेत तुम किनारा
मैं बाती तुम उजियारा
पूछती हो मुझसे मेरी..............
मैं गीत तुम सरगम
मैं प्रीत तुम हमदम
मैं पंछी तुम गगन
मैं सुमन तुम चमन
पूछती हो मुझसे मेरी..............
मैं बादल तुम बारिश
मैं वक्त तुम तारिख
मैं साहिल तुम मौज
मैं यात्रा तुम खोज
पूछती हो मुझसे मेरी...............
मैं मन तुम विचार
मैं शब्द तुम आकार
मैं कृत्य तुम मान
मैं शरीर तुम प्राण
पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम
मेरी कौन हो तुम...........
मेरी कौन हो तुम...........!!
मेरी कौन हो तुम !
पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम !
मैं पथिक तुम राह
मैं तरु तुम छाँव
मैं रेत तुम किनारा
मैं बाती तुम उजियारा
पूछती हो मुझसे मेरी..............
मैं गीत तुम सरगम
मैं प्रीत तुम हमदम
मैं पंछी तुम गगन
मैं सुमन तुम चमन
पूछती हो मुझसे मेरी..............
मैं बादल तुम बारिश
मैं वक्त तुम तारिख
मैं साहिल तुम मौज
मैं यात्रा तुम खोज
पूछती हो मुझसे मेरी...............
मैं मन तुम विचार
मैं शब्द तुम आकार
मैं कृत्य तुम मान
मैं शरीर तुम प्राण
पूछती हो मुझसे
मेरी कौन हो तुम
मेरी कौन हो तुम...........
मेरी कौन हो तुम...........!!
सुमन ‘मीत’
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
तेरा अहसास........‘मन’ मेरे
तेरा अहसास.....‘मन’ मेरे
मेरे वजूद को
सम्पूर्ण बना देता है
और मैं
उस अहसास के
दायरे में सिमटी
बेतस लता सी
लिपट जाती हूँ
तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से
तब मेरा वजूद
पा लेता है
एक
नया स्वरूप
उस तरंग सा
जो उभर आती है
शांत जल में
सूर्य की पहली किरण से
झिलमिलाती है ज्यूँ
हरी दूब में
ओस की नन्ही बूंद
तेरी वो खुली बाहें
मुझे समा लेती हैं
जब
अपने आगोश में
तो ‘मन’ मेरे
मेरा होना सार्थक
हो जाता है
मेरा अस्तित्व
पूर्णता पा जाता है
और उस
समर्पण से अभिभूत हो
मेरी रूह के
जर्रे जर्रे से
तेरी खुशबू आने लगती है
और महक जाता है
मेरा रोम रोम......
पुलकित हो उठता है
एक ‘सुमन’ सा
तेरे अहसास का
ये दायरा
पहचान करा देता है
मेरी
मेरे वजूद से और
मेरे शब्दों को
आकार दे देता है
मेरी कल्पना को
मूरत दे देता है....
मैं
उड़ने लगती हूँ
स्वछ्न्द गगन में
उन्मुक्त
तुम संग
निर्भीक ,निडर
उस पंछी समान
जिसकी उड़ान में
कोई बन्धन नहीं
बस हर तरफ
राहें ही राहें हों.....
‘मन’ मेरे
तेरा ये अहसास
मुझे खुद से मिला देता है
मुझे जीना सिखा देता है
‘मन’ मेरे.....
‘मन’ मेरे...........!!
सु.मन
मेरे वजूद को
सम्पूर्ण बना देता है
और मैं
उस अहसास के
दायरे में सिमटी
बेतस लता सी
लिपट जाती हूँ
तुम्हारे स्वप्निल स्वरूप से
तब मेरा वजूद
पा लेता है
एक
नया स्वरूप
उस तरंग सा
जो उभर आती है
शांत जल में
सूर्य की पहली किरण से
झिलमिलाती है ज्यूँ
हरी दूब में
ओस की नन्ही बूंद
तेरी वो खुली बाहें
मुझे समा लेती हैं
जब
अपने आगोश में
तो ‘मन’ मेरे
मेरा होना सार्थक
हो जाता है
मेरा अस्तित्व
पूर्णता पा जाता है
और उस
समर्पण से अभिभूत हो
मेरी रूह के
जर्रे जर्रे से
तेरी खुशबू आने लगती है
और महक जाता है
मेरा रोम रोम......
पुलकित हो उठता है
एक ‘सुमन’ सा
तेरे अहसास का
ये दायरा
पहचान करा देता है
मेरी
मेरे वजूद से और
मेरे शब्दों को
आकार दे देता है
मेरी कल्पना को
मूरत दे देता है....
मैं
उड़ने लगती हूँ
स्वछ्न्द गगन में
उन्मुक्त
तुम संग
निर्भीक ,निडर
उस पंछी समान
जिसकी उड़ान में
कोई बन्धन नहीं
बस हर तरफ
राहें ही राहें हों.....
‘मन’ मेरे
तेरा ये अहसास
मुझे खुद से मिला देता है
मुझे जीना सिखा देता है
‘मन’ मेरे.....
‘मन’ मेरे...........!!
सु.मन
सोमवार, 29 नवंबर 2010
याद का बीज
कुछ दिन हुए एक कांटा उभर आया है
उससे जख़्म-ए-दिल को सिल रही हूँ ।
सु..मन
सोमवार, 1 नवंबर 2010
जीवन राग
कुछ दिनों के बाद इस ब्लॉग को शुरू किये एक साल हो जायेगा ।जब ये सफर शुरू किया तो सोचा भी न था कि आप लोगों का इतना प्यार मिलेगा ......आज न जाने क्यूँ ब्लॉग की अपनी पहली कविता आप सबके साथ साझा करना चाहती हूँ .........
जीवन राग
जीवन राग की तान मस्तानी
समझे न ये मन अभिमानी ;
बंधता नित नव बन्धन में
करता क्रंदन फिर मन ही मन में ;
गिरता संभलता चोट खाता
बावरा मन चलता ही जाता ;
जिस्म से ये रूह के तार
कर देते जब मन को लाचार ;
होता तब इच्छाओं का अर्पण
मन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;
छंट जाता स्वप्निल कोहरा
दिखता जीवन का स्वरूप दोहरा ;
स्मरण है आती वो तान मस्तानी
न समझा था जिसे ये मन अभिमानी !!
सु..मन
जीवन राग
जीवन राग की तान मस्तानी
समझे न ये मन अभिमानी ;
बंधता नित नव बन्धन में
करता क्रंदन फिर मन ही मन में ;
गिरता संभलता चोट खाता
बावरा मन चलता ही जाता ;
जिस्म से ये रूह के तार
कर देते जब मन को लाचार ;
होता तब इच्छाओं का अर्पण
मन पर ज्यूँ यथार्थ का पदार्पण ;
छंट जाता स्वप्निल कोहरा
दिखता जीवन का स्वरूप दोहरा ;
स्मरण है आती वो तान मस्तानी
न समझा था जिसे ये मन अभिमानी !!
सु..मन
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
बेमानी सब..........
अपनों का अपनापन झूठा सा लगता है
क्या कहें क्यों सब बेमानी सा लगता है
था सच जो दिखावा सा लगता है
हर रिश्ता अब तो टूटता सा लगता है
धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
पड़ गई गांठ उसमे गुमां सा लगता है
चमकता था हमेशा वो चाँद झूठा लगता है
चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है
था बन्धन रिश्तों का धोखा सा लगता है
हर कड़ी का सिरा खुला सा लगता है
रिश्तों का हर पहलु बदला सा लगता है
खुद जिंदगी से अपनी डर सा लगता है
छोटा दायरा सोच का बढ़ा सा लगता है
तड़पने के सिवा नहीं काम कुछ लगता है
जिंदगी रह गई है इन सोचों के लिये शायद
कुछ कम कुछ ज्यादा सबब रहता है................!!
सु..मन
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
अहसास
अहसास
एक अबोध शिशु
माँ के आँचल में
लेता है जब
गहरी नींद
माँ उसको
अपलक निहारती
बलाऐं लेती
महसूस है करती
अपने ममत्व को
वो आगाज़ हूँ मैं .........
विरह में निष्प्राण तन
लौट है आता
चौराहे के छोर से
लिये साथ
अतीत की परछाई
भविष्य की रुसवाई
पथरीली आँखों में
सिवाय तड़प के
कुछ नहीं
वो टूटन हूँ मैं ...........
कोमल हृदय में
देते हैं जब दस्तक
अनकहे शब्द
उलझे विचार
मानसपटल पर
करके द्वन्द
जो उतरता है
लेखनी से पट पर
वो जज़्बात हूँ मैं .........
थकी बूढ़ी आँखें
जीवन की कड़वाहट का
बोझ लिए
सारी रात खंगालती हैं
निद्रा के आशियाने को
या फिर
बाट जोहती हैं
अपने अगले पड़ाव का
वो अभिप्राय हूँ मैं ...........
वो आगाज़ में पनपा
टूटन में बिखरा
जज़्बात में डूबा
अभिप्राय में जन्मा
‘अहसास’ हूँ मैं !!
सुमन ‘मीत’
माँ के आँचल में
लेता है जब
गहरी नींद
माँ उसको
अपलक निहारती
बलाऐं लेती
महसूस है करती
अपने ममत्व को
वो आगाज़ हूँ मैं .........
लौट है आता
चौराहे के छोर से
लिये साथ
अतीत की परछाई
भविष्य की रुसवाई
पथरीली आँखों में
सिवाय तड़प के
कुछ नहीं
वो टूटन हूँ मैं ...........
देते हैं जब दस्तक
अनकहे शब्द
उलझे विचार
मानसपटल पर
करके द्वन्द
जो उतरता है
लेखनी से पट पर
वो जज़्बात हूँ मैं .........
जीवन की कड़वाहट का
बोझ लिए
सारी रात खंगालती हैं
निद्रा के आशियाने को
या फिर
बाट जोहती हैं
अपने अगले पड़ाव का
वो अभिप्राय हूँ मैं ...........
वो आगाज़ में पनपा
टूटन में बिखरा
जज़्बात में डूबा
अभिप्राय में जन्मा
‘अहसास’ हूँ मैं !!
सुमन ‘मीत’
शनिवार, 4 सितंबर 2010
ज़ख्म
ज़ख्म
बन्द हैं चौखट के उस पार
अतीत की कोठरी में
पलों के रत्न जड़ित
आभूषण
एक दबी सी आहट
सुनाती
एक दीर्घ गूंज
समय चलता
अपनी उलटी चाल
घिरता कल्पनाओं का लोक
लम्हों को परिचालित करता
अपने अक्ष पर
प्रतिध्वनित हो उठती
अनछुई छुअन
सरिता बन जाता
समुद्र का ठहराव
हरित हो उठती
पतझड़ की डालियाँ
लघु चिंतन में
सिमट जाता
पूरा स्वरूप
बन जाता
फिर......
एक रेत का महल
खुशियों का लबादा ओढ़े
दस्तक देता प्रलय
ढेर बन गए महल में
दब जाती
वो गूंज
रत्नों पर फन फैलाए
समय का नाग
डस लेता
देता एक सुलगता ज़ख्म
रिसता है जो
शाम ढले
उस चौखट को देखकर..........!!
सु..मन
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
विचारों की चहलकदमी................
ये जो हमारा मन है ......बहुत बावरा है...........और इस मन में पनपते विचार उन्मुक्त पंछी........जो बस हर वक्त दूर गगन में उड़ना चाहते हैं .........कभी भोर की पहली किरण में.....कभी शाम की लाली में.......तो कभी रात की तन्हाई में............बस चहलकदमी करते रहते हैं .....कुछ इस तरह..............
विचारों की चहलकदमी................
आँखें बन्द करने पर
ख़्वाब कहाँ आते हैं ;
विचारों की चहलकदमी में
पल बीतते जाते है ;
नहीं रुकते उसके कदम
चलते ही जाते हैं ;
नहीं होता कोई बन्धन
बढ़ते ही जाते हैं ;
कभी चेहरे पर हंसी
कभी रुला जाते हैं ;
लाख चाहने पर भी
पकड़ में न आते हैं ;
सुलझाने की कोशिश में
उलझते ही जाते हैं ;
ये ‘विचारों’ की है जुम्बिश
जिसमें सब जकड़े जाते हैं ;
ज्यूं नदी की हर मौज में
किनारे धंसते जाते हैं !!
सुमन ‘मीत’
विचारों की चहलकदमी................
आँखें बन्द करने पर
ख़्वाब कहाँ आते हैं ;
विचारों की चहलकदमी में
पल बीतते जाते है ;
नहीं रुकते उसके कदम
चलते ही जाते हैं ;
नहीं होता कोई बन्धन
बढ़ते ही जाते हैं ;
कभी चेहरे पर हंसी
कभी रुला जाते हैं ;
लाख चाहने पर भी
पकड़ में न आते हैं ;
सुलझाने की कोशिश में
उलझते ही जाते हैं ;
ये ‘विचारों’ की है जुम्बिश
जिसमें सब जकड़े जाते हैं ;
ज्यूं नदी की हर मौज में
किनारे धंसते जाते हैं !!
सुमन ‘मीत’
शनिवार, 14 अगस्त 2010
नमन शहीदों को...............
15 अगस्त 1947 हमारा प्रथम स्वतंत्रता दिवस...............वो दिवस जिसे सभी आँखें देख पाई न देख सके हमारे शहीद जवान जो अपनी मातृभूमि के लिये हंसते हंसते कुर्बान हो गये । आज हमारे 63वें स्वतंत्रता दिवस पर ‘श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी’ की यह कविता उन सभी जवानों और उनके परिवार वालों को समर्पित है जिन्होंने आजादी की जंग में अपनों को खोया है...............
पुष्प की अभिलाषा
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गुँथा जाऊँ,
चाह नहीं , प्रेमी माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं, सम्राटों के सर पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सर पर
चढ़ूं , भाग्य पर इठलाऊँ ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली !
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने ,
जिस पथ जाएँ वीर अनेक !!
माखनलाल चतुर्वेदी
सदस्यता लें
संदेश (Atom)


.jpg)

.jpg)
.jpg)
.jpg)


