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शनिवार, 20 जून 2015

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-३)











कभी कभी यूँ ही मन खिन्न सा हो जाता है | अकारण ही बिना किसी वजह के | एक क्षण शांत दूसरे क्षण उतना ही व्याकुल | क्यों ऐसा होता है ? किसी एक व्यक्ति के साथ नहीं शायद हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ये क्षण आते हैं | इसका कारण जानने के प्रयास में बस यही जान पाई कि हमारा अचेतन मन कहीं न कहीं सक्रीय है बिना किसी हलचल के ..बस ताकता रहता है हमें हमारे कर्मों को ..कुछ नहीं बोलता बस थामे रखता है हर लम्हा हमारी जिंदगी का | जिदंगी चलती जाती है और हम भी ..फिर किसी क्षण हमारा मन उद्वेलित हो उठता है या यूँ कहूँ कि हमारे चेतन जगत में अपनी सक्रियता बताने लगता है तो उस क्षण हम खिन्न हो उठते हैं | अकारण ही हमें लगता है कि कोई कारण नहीं है पर कारण कहीं न कहीं छिपा पड़ा है जो हम देख नहीं पाते क्यूंकि हमारे आज से उसका कोई मेल नहीं , हम सोचते हैं आज तो जिदंगी ठीक चल रही है बिना किसी रोक टोक के ..फिर ये भटकन क्यूँ ? पर ये वही सबकुछ है.. दबा सा..हमारी सोच का हिस्सा जो कहीं दफ़न होता है मन के किसी कोने में और जाने अनजाने , चाहे अनचाहे धीरे धीरे सरक रहा होता है समय के साथ साथ और किसी क्षण में हमें अपने होने का एहसास दिलाने के लिए यूँ आकर मिलता है अकारण ही.. निशब्द में लीन होकर हमें बहुत कुछ कह जाता है !!

अकारण और कारण के बीच की नजदीकी कमतर थी या होने और ना होने के बीच का फासला.. क्या मालूम ..हाँ, अनकहा जो सुना , बहुतेरा था उस एक क्षण के लिए !!

सु-मन 

मंगलवार, 19 मई 2015

शबनमी मोती














....रात 
दर्द की शबनम से 
निकले कुछ हर्फ़ फलक से 
और आ बैठे मेरे सरहाने 
घुल कर अश्कों से 
टिमटिमाने लगे मोती की तरह 
जाने कितने मोती बीन कर 
रख लिए कोरे कागज़ पर 
फिर बंद कर दी किताब 
ज़ेहन में भींच कर |

सुबह तलक -
धुन्धली होती रही रात 
मोती ज़ेहन को चुपचाप शबनमी करते रहे !!


सु-मन 

शुक्रवार, 8 मई 2015

हाँ मैं नास्तिक हूँ













हाँ मैं नास्तिक हूँ
नहीं बजाती
रोज़ मंदिरों की घंटियाँ
ना ही जलाती हूँ
आस का दीपक
नहीं देती
ईश्वर को दुखों की दुहाई
ना ही करती हूँ
क्षणिक सुखों की कामना
नहीं चढ़ाती
जल फूल फल मेवा
ना ही जपती हूँ
आस्था के मनके की माला |

हाँ, मैं दूर बैठ
मांगती हूँ
अपने कर्मों को भोगने की शक्ति
जीए जा सकने वाली सहनशीलता
अपने कर्तव्यों के निर्वहन की क्षमता
सुख दुख को आत्मसात करने का संबल
मृत्यु का अभिनन्दन करने का साहस |

हाँ मैं नास्तिक हूँ
हाँ मैं नास्तिक हूँ !!

सु-मन


गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

हॉट स्पॉट











चींटियों सी रेंगती है 
सीधी लाइन में गाड़ियाँ 
मशीन से दौड़े जाते हैं लोग 
रहता है मोबाईल 
24*7 ऑलवेज़ ऑन 
सजती हैं महफ़िलें 
हर रात ऑन टाईम 
खाली घर को ताकती हैं 
एसी में बंद खिड़कियाँ 
खुला आकाश रखता है 
सबको पूरा दिन हॉट 
पार्सल में लिपट कर 
खाना बजाता है डोर बैल 
शाम ढले टेरिस पर 
झूला झूलते हैं कुछ बेजान पौधे
इक शहर का व्यस्त जीवन 
यूँ हॉट स्पॉट बन जाता है !!



सु-मन 

मंगलवार, 24 मार्च 2015

पहले और बाद











उम्र शुरू होने के ठीक पहले
और उम्र ढल जाने के ठीक बाद
होती हैं बहुत सारी बातें
अनगिनत आँकी जाने वाली अटकलें
रख लिया जाता वजूद कसौटी पर
दम तोड़ जाते हैं कुछ रिश्ते
और चेहरा देता है गवाही
वक़्त के कटहरे में खड़े होकर ।

हाथ थामने से ठीक पहले
और हाथ छूट जाने के ठीक बाद
होता है बहुत कुछ कहने को
रह जाते हैं जुबान पर टिक कर
कुछ अनकहे शब्द
दिल की हांडी में पकते रहते है
कुछ ख़्वाब, दिलासे और ढेर सारे जज़्बात
जिंदगी होती है बसर
यादों की चिंगारी में जलकर ।

गांठ पड़ने से ठीक पहले
और गांठ खुल जाने के ठीक बाद
होता है रिश्ता कुछ और
बिखर जाती हैं हर तरफ
वहम के बेहिसाब रेशों की कतरने
टिकी रहती है सूई की नोक पर 
विश्वास के पहनावे से उधड़ी आस
उम्र देखती है एक कोने में बैठ
रफ्फू के कच्चे धागों की पकड़ ।

अंतिम साँस से ठीक पहले 
और साँस टूट जाने के ठीक बाद 
होता है क्या कुछ, नहीं पता
पता है तो बस इतना 
साँस लेना एक आदत है शायद 
एक निर्लज आदत ,एक बेशर्म रवायत 
जो नहीं बदलती 
उम्र शुरू होने से उम्र ढलने तक
जो नहीं छूटती
हाथ थामने से हाथ छूटने तक 
जो नहीं टूटती 
गाँठ पड़ने से गाँठ खुलने तक ।

पहले पल से ठीक पहले 
और बाद पल के ठीक बाद 
होता है बहुत कुछ अनचिन्हा
इन शब्दों के दायरे से परे 
चिन्हित है तो बस इतना कि 
एक आदत में गुजर जाती है जिंदगी
एक गाँठ में सिमट जाती है आख़िरी साँस !!


सु-मन 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

इंतज़ार नमी का...










शाम ढल चुकी है 
दूर पहाड़ के टीले पर 
कुछ तारों का जमघट 
देख रहा चाँद की राह 
मेरे हिस्से के आसमां  में 
है नमी सी 
भरी भरी नमी और खाली खाली आसमां 
चाँद को है इंतज़ार 
बदली हटने का 
और मुझे 
इंतज़ार नम होने का !!
***
एक हिस्से में सूखापन है बहुत 
कुछ नमी की तरावट लाज़मी है शायद !!


सु-मन  

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

ये कैसा है ज़ेहाद














ये कैसा है ज़ेहाद
कैसा सकूँ-ए-रूह है
खाक करना अमन-ओ-वतन
किस मजहब का असूल है

ये कैसी है सरहद
कैसी मजहबी तलवार है
उजाड़ देना माँ की कोख़
किस इबादत का यलगार है

ये कैसा है जुनून
कैसा क़त्ल-ए-आम है
छीन लेना लख्त-ए-ज़िगर
किस अल्लाह का पैगाम है

ये कैसा है करम..तेरा मौला
कैसा रहमत का तूफान है
आँगन बना उजड़ा चमन
हर घर तब्दील कब्रिस्तान है
हर घर तब्दील कब्रिस्तान है....!!



सु-मन 

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-२)














मन !
ये जो आस की तुरपन है ना ..उधड़ी जाती है अब ..विश्वास के धागे को सिलते सिलते डगमगाती सूई की चुभन का स्पर्श मेरे ज़िस्म से होकर तुम तक जो पहुंचा तो तुम भी रो दिए मुझ संग | विश्वास के धागे की पकड़ कम रही या या आस की तुरपन से बने उन खाली हिस्सों की लम्बाई की बढ़त जिनमें कुछ फ़ासला होना जायज़ था | इस बढ़ते खालीपन को सिलना या यूँ कहो भरना आस का कारण था | ऐसा क्यूँ होता है मन .. क्यूँ एक पल में बंधी आस दूजे पल टूट जाती है | क्यूँ लम्हों को सिलना फिर खुद उन्हें उधेड़ना पड़ता है और वक़्त की मुट्ठी में कैद आस को खालीपन में बींध कर चिन्हित करना पड़ता है भीतर कहीं तुम्हारे पास ||

आस बंधी और फिर टूट गई ..खबर भी नहीं हुई किसी को ..क्या कुछ घट गया भीतर नहीं जान पाया कोई ..जो कुछ घटा तेरे मेरे बीच घटा .. मन अब तो समझा दे ..तू मेरा कौन है !!


सु-मन 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-१)











मन !

जानते हो, तुम कौन हो ? शायद नहीं और शायद ही मैं कभी परिभाषित कर पाऊं तुम्हें | जब कभी कोशिश की तुम्हें पाने की ..तुम्हें जानने की ...तुम खो गए ..अनभिज्ञ बन गए और जब कभी तुमसे दूर जाना चाहा ..तुम ख़ामोश साये की तरह साथ चलते रहे | मैं अक्सर तुमसे पूछती , तुम्हारे होने का सबब और जवाब में एक ख़ामोशी के सिवा कुछ नहीं मिलता | शब्दों को टटोलते हुए जब कभी मेरी ख़ामोशी धीरे – धीरे तुम्हारी ख़ामोशी में उतरती...कुछ शेष नहीं बचता ...जानते हो उस एक क्षण में एक वर्तुल मेरी रूह को घेर शब्द और ख़ामोशी के हर दायरे को पार कर जो रचता ..मुझे तुम्हारे होने का एहसास देता .... मुझे मुझसे मिला देता ....मुझे जीना सीखा देता | शब्द से ख़ामोशी तक के इस सफ़र की निर्वात यात्रा के मेरे एकल साथी मुझे यूँ ही अपनी पनाह में रखना !!

ये जो तेरे मेरे बीच की बात है ... बेवजह है शायद ...कुछ बेवजह बातें हर वजह से परे होती हैं... है ना ‘मन’ !!



सु-मन 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

मेरा 'बावरा मन' तू तो चर्चा-ए-आम हो गया रे

मेरे ब्लॉग 'बावरा मन' की चर्चा लगभग सात राज्यों से प्रकाशित 'पत्रिका समाचार पत्र' में ...
शुक्रिया मेरे मन ...मेरे लफ्ज़ों ..तुम बिन मैं कुछ भी नहीं | पत्रिका टीम का शुक्रिया और आभारी हूँ पाबला जी की जिन्होंने मुझे इसकी जानकारी दी | उन सभी पाठकों और ब्लोगर्स का तहे दिल से शुक्रिया जिन्होंने मेरे लेखन को सराहा और मेरे लफ्ज़ों को गति दी...शुक्रिया मेरे मौला ..यूँ ही मुझ पर अपना करम बनाये रखना !!

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