कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
शुक्रवार, 11 नवंबर 2016
गुरुवार, 3 नवंबर 2016
गुरुवार, 21 जुलाई 2016
जिंदगी मुबारक !
रहें ना रहें हम , महका करेंगे
बात कई महीनों पहले की है | हमारे ऑफिस के प्रांगण में सामने की तरफ खाली पड़ी जगह थी जिसमें मैं पौधे
लगाना चाहती थी पर सभी द्वारा मेरी बात नज़रअंदाज़ की जाती रही | मैंने कुदाली खरीद
कर खुद क्यारी बनाई और इधर उधर से लकड़ी लाकर बाड़ लगा दिया क्योंकि आवारा पशु यहाँ
वहां घूमते रहते और पौधों को तोड़ देते | पास के एक घर में काफी पौधे लगे थे उनसे
मांग कर लगाये | रोज़ पानी देती | ऑफिस के लोग जो ज्यादातर गाँव से आते हैं मुझे
देख कर हंस कर कहते कि सुमन हमारे खेतों में भी काम कर जाना | कुछ लोगों के अंदाज़ में
व्यंग होता कुछ के मजाक |
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| Temporary कुदाली |
एक बार शायद रात को कोई गाय वगैरा आई होगी उसने एक तरफ
से बाड़ का डंडा तोड़ दिया , मैं सुबह उसे ठीक कर रही थी कि हमारे सर ( खंड विकास
अधिकारी ) आये उन्होंने खुद उसे ठीक करने में मेरी मदद की, मैंने उनसे रेलिंग
लगवाने के लिए बोला लेकिन बजट कहाँ से आएगा ये कह बात टल गयी | धीरे धीरे सभी लोग
इस क्यारी की रखवाली करने लगे | जो लोग हंसते थे उन्होंने ने ही गाँव से पौधे लाकर
मुझे दिए मैं कहती आप लगा दो तो बोलते नहीं, आपकी क्यारी है आप ही लगाओगे | मैं
खुश थी लोगों का नजरिया बदल रहा था |
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| कुछ वक्त पहले |
ऐसे ही एक दिन क्यारी के बीच में जो बिजली का
खम्बा है उसको सीधा करने के लिए बिजली कर्मचारी आये , क्यारी और पौधे खराब हो गए तभी सर
बाहर आये तो साथ में खड़े एक कलीग बोलते - सुमन की क्यारी सारी खराब हो गई | सर
अच्छे मूड में थे कहा ..चलो लिखो ऑफिस नोट, मैं अप्रूव करता हूँ | मैं तो उछल पड़ी
, उसी वक़्त ऑफिस नोट लिख कर अप्रूव हो गया और आज सभी लोग मुझे मुबारक दे रहे और
नर्सरी से पेड़ और पौधे भी आ रहे | मैं बहुत खुश हूँ मेरी क्यारी अपना वजूद पा गयी
|
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| काम शुरू |
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| अब खूब फूल खिलेंगे |
कभी कभी सोचती हूँ इसमे कुछ भी
मेरा नहीं है फिर क्यूँ इतनी जिद और मेहनत की , कल को इस ऑफिस में रहूँ ना रहूँ
क्या पता | ये क्यारी बनाने का मकसद बस इतना था कि अगर अपने चारों ओर अच्छा देखने
को मिले तो मन भी अच्छा रहता है वरना और भी काम है जिन्दगी में पेड़ पौधे लगाने के
सिवा ;)
इस क्यारी को नई जिन्दगी मुबारक !
इस बरस इस क्यारी में खूब सुमन महकेंगे और इस सु-मन का मन बाग बाग हो जायेगा |
सु-मन
शुक्रवार, 24 जून 2016
एक हद तक
एक हद तक
जीये जा सकते हैं सब सुख
एक हद तक ही
सहा जा सकता है कोई दुख
सरल सी चाही हुई जिंदगी में
मिलती हैं कई उलझने
बेहिच बदल देते हैं हम रास्ता
मनचाहे को पाने के लिए
भूल जाते हैं अक्सर
पाने के लिए कुछ खोने की गहरी बात
तय करना चाहते हैं खुद
अपने आकाश का दायरा
छोड़ देते हैं अपना धरातल
निष्क्रिय समझ कर लेते किनारा
आज को कल में बदलते देख
बदल जाते हैं हम भी
करते है भूलने की कोशिश
भूत के गोद में बिताये मुश्किल दिनों को
बीतते जाते हैं यूँ ही
साल दर साल
तय होती रहती है सोच की हदें
ख़्वाब और ख़याल के मायने जान कर
भविष्य के गर्भ में छिपा है क्या कुछ
जाने बगैर चाहते हैं हम
अपने हिस्से में सिर्फ ख़ुशी
जो बीता, वो था कभी भविष्य
जो आज है भविष्य
होगा कल का वर्तमान
हर समय की तय होती है एक हद
सुख और दुख के बंटवारे के साथ
भोगा हुआ सुख
बढ़ा देता है और सुखों की कामना
भुलाया हुआ दुख
चाह कर भी नहीं हो पाता हमसे जुदा
दरअसल,
एक हद तक
भुला जा सकता है कोई भोगा दुख
एक हद तक ही
की जा सकती है किसी सुख की कामना !!
********
सु-मन
शनिवार, 21 मई 2016
मेरे जाने के बाद
मेरे जाने के बाद
होती रहेंगी यूँ ही सुबहें
शामें भी गुजरेंगी इसी तरह
रातें कभी अलसाई सी स्याह होगीं
कभी शबनमी चांदनी से भरपूर
खिला करेंगे यूँ ही
ये बेशुमार फूल इस आँगन
कमरा यूँ ही सजा रहेगा
कुछ मामूली और कीमती चीज़ों से
यूँ चलती रहेगी घड़ी टिक-टिक
चलता रहेगा वक़्त अपनी चाल
धड़कता रहेगा दिल सबके सीने में
होती रहेगी साँसों की आवाजाही इसी तरह
कुछ भी तो नहीं बदलता?
एक इंसान के जाने के बाद...
होती रहेंगी यूँ ही सुबहें
शामें भी गुजरेंगी इसी तरह
रातें कभी अलसाई सी स्याह होगीं
कभी शबनमी चांदनी से भरपूर
खिला करेंगे यूँ ही
ये बेशुमार फूल इस आँगन
कमरा यूँ ही सजा रहेगा
कुछ मामूली और कीमती चीज़ों से
यूँ चलती रहेगी घड़ी टिक-टिक
चलता रहेगा वक़्त अपनी चाल
धड़कता रहेगा दिल सबके सीने में
होती रहेगी साँसों की आवाजाही इसी तरह
कुछ भी तो नहीं बदलता?
एक इंसान के जाने के बाद...
मेरी प्रिय !
मेरे जाने के बाद
तुम भी नहीं बदलोगी
मैं रहूंगी जिन्दा तुम्हारे सृजन के मेरे हर लफ्ज़ में
जीयूँगी हर अधूरी ख्वाहिशें
मेरी डायरी के हर वरक में धड़कती तुम
जब कभी पढ़ी जाओगी
मेरी चाही हुई नेमतों को मिलेगी साँसें
जब कोई लिखे एहसास को आत्मसात कर
मोड़ लेगा उस वरक का किनारा ,फिर पढ़ने को
जी लूँगी उस क्षण
चाही हुई एक मुक्कमल जिंदगी !!
***
जो जीया उसे लिखना आसान नहीं ...जो लिखा उसे जीना । जिंदगी का कविता होना या कविता का जिंदगी होना जायज़ है या नाजायज़.. नहीं पता । हाँ , हर लिखे लफ्ज़ में जी हुई नाजायज़ साँसों की कर्ज़दार हूँ !!
मेरे जाने के बाद
तुम भी नहीं बदलोगी
मैं रहूंगी जिन्दा तुम्हारे सृजन के मेरे हर लफ्ज़ में
जीयूँगी हर अधूरी ख्वाहिशें
मेरी डायरी के हर वरक में धड़कती तुम
जब कभी पढ़ी जाओगी
मेरी चाही हुई नेमतों को मिलेगी साँसें
जब कोई लिखे एहसास को आत्मसात कर
मोड़ लेगा उस वरक का किनारा ,फिर पढ़ने को
जी लूँगी उस क्षण
चाही हुई एक मुक्कमल जिंदगी !!
***
जो जीया उसे लिखना आसान नहीं ...जो लिखा उसे जीना । जिंदगी का कविता होना या कविता का जिंदगी होना जायज़ है या नाजायज़.. नहीं पता । हाँ , हर लिखे लफ्ज़ में जी हुई नाजायज़ साँसों की कर्ज़दार हूँ !!
सु-मन
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (८) ख़याली दीमक
पिछले 2-3 बरस के सहेज कर रखे सामान को टटोला तो पाया कि वक़्त के साथ-साथ बदलने लगा है सब । उस वक्त के सहेजे इस सामान में फफूंद लगने लग गई है । बहुत बचा के रखा था कि बेशकीमती ये सामान यूँ ही नया नया रहे । पर इक उम्र होती है हर चीज़ की, उसके बाद वो नयापन फीका पड़ जाता है उसकी जड़ता दम तोड़ने लगती है । ये सोच अब उनको छाँटना शुरू कर दिया है । कुछ बेलिबास से लफ्ज़ टंगे थे अलमारी के एक खाने में, उनको स्याही का जामा पहना कर रख दिया है सबसे नीचे के दराज़ में । कुछ अनछुई सी यादें विंड चाईम के धागे से जब उलझती थी तो हवा में नमी फैल जाती थी, उन यादों को घर के बंद पड़े पिछले दरवाजे पर सुलझा आई हूँ ।
उलझन कुछ भी नहीं थी और सुलझा कुछ भी नहीं... लफ्ज़ ख़ामोश भी नहीं थे और आवाज़ का शोर भी नहीं था .. फिर भी इस कीमती सामान को अलग रख दिया अब दीमक लगने से पहले ।
असल में इन ख़याली दीमक से बहुत परेशान हूँ मैं !!
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-७)
मंगलवार, 1 मार्च 2016
सोच की हद
हर बार सोचती हूँ
एक हद में सिमट जाऊँ
कर लूँ अपनी सोच को
एक अँधेरी कोठरी में बंद
दुनिया की रवायत संग
जीने लगूं एक बेनाम जिंदगी
बांध अपने पैरों में बेड़ियाँ
चल दूँ राह पर उस तरफ
जिस तरफ ले जाना चाहे कोई
दिल दिमाग के हर दरवाजे पर
लगा दूँ एक जंग लगा ताला
मन के वांछित कारावास से
कर दूँ निर्वासित अपना वजूद !
*****
सोच से हदें तय हुई या हदों से सोच ..कौन जाने ...जाना तो बस इतना कि हदों की
खूंटी पर टंगे रहते हैं वजूद के लिबास और सोच के ज़िस्म पर पहनाई जाती हैं कुछ बेड़ियाँ
!!
सु-मन
शनिवार, 20 फ़रवरी 2016
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (७)
खोया कुछ भी नहीं जो पाया था । जो पाया था वो अब तक भीतर है ।उसे खोया ही नहीं जा सकता । तुम हमेशा खोजते रहते थे भटकते रहते थे यहाँ वहां । सब कुछ तो यहीं था भीतर, सब जगह तलाशा तुमने बस अपने भीतर नहीं देखा । मैंने भीतर देखा और पा लिया । तुम गए कब थे जो वापिस तुम्हारी राह निहारूं । जब पाया था तो स्व को खोकर आत्मसात कर लिया था । जानती थी एक दिन तुम बंधन से मुक्त होना चाहोगे क्यूंकि तुम्हारे लिए मात्र बंधन है प्रेम । तुम एक बंधन में बंधे , कारण खोजते रहे क्यूँकर हुआ प्रेम । सब तो परिपूर्ण था क्यूँ हुआ । जरा सा बंधन छूटा की क्षीण पड़ गया । रूह को नहीं छुआ था शायद तभी छूटा । रूह तक महसूस करते तो पाते सब खो जाता है कुछ नहीं बचता शेष । सब समाहित हो जाता है । रीत जाता है । उस रीतने में जो सुख मिलता है वो उम्र भर खोजते रहोगे तब भी न मिलेगा । भटकते रहोगे ताउम्र नहीं मिलेगा । गर मिलना हो एक क्षण भी न लगेगा । मैंने पा लिया उस क्षण जब स्व को त्याग आत्मसात कर लिया। बंधन नहीं खुद को खुला छोड़ दिया था निर्वात यात्रा में तुम संग और दिशा विहीन सोच को बह जाने दिया था तुम्हारे अनुरूप । खोने और पाने के बीच के अंतराल में टिका 'मन' आज भी चल रहा निर्वात यात्रा पर अकारण ..अनथक !!!
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-६)
शुक्रवार, 29 जनवरी 2016
शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (६)
खाली को भरने की कवायद में भरते गए सब कुछ अंदर । कुछ चाहा कुछ अनचाहा । भर गया सब..बिलकुल भरा प्रतीत हुआ, लेश मात्र भी जगह बाकी ना रही । फिर भी उस भरे में कुछ हल्कापन था । कुछ था जो कम था...दिखने में सब भरा भरा..फिर खाली खाली सा । भरे की तलाश कम नहीं हुई ..भटकते रहे उसकी तलाश में । जो मिला भर लिया अंदर..खाली को भरना भर था । भरता गया खालीपन अंदर..पूरा भर गया... तलाश ख़त्म ना हुई | भरे हुए में शेष की मौजूदगी हमेशा भरती है कुछ अंदर |
भरे हुए खालीपन में अभी और जगह बाकी है !!
सु-मन
पिछली कड़ी : शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (भाग-५)
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