कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013
शुक्रवार, 18 जनवरी 2013
शब्द
शब्द, शब्दों
में तलाशते हैं मुझे
और मैं ...उन
शब्दों में तुम्हें !
रात जर्द
पत्ते सी शबनम को टटोलती
चाँद जुगनू सा
मंद मंद बुझा सा
नदी खामोश
किनारों को सहलाती हुई
तब दूर कहीं
सन्नाटे के जंगल में
सुनाई देता है
मुझे दबा सा
कुछ अनकहे अनसुने
शब्दों का शोर
धूमिल सी
अधकच्चे विचारों की पगडंडी
उस शोर की तरफ
बढ़ते अनथक दो कदम
कदम, कदमों
में थामते हैं मुझे
और मैं...उन
क़दमों में तुम्हे !
शब्द, शब्दों
में तलाशते हैं मुझे
और मैं ...उन
शब्दों में तुम्हें !!
सु-मन
(Special thanks to Manuj Ji for giving his voice to my words)
(Special thanks to Manuj Ji for giving his voice to my words)
सोमवार, 24 दिसंबर 2012
आखिर कब तक ???
कब
तक लूटती रहेगी
रोज
अस्मत सरे बाज़ार
कब
तक यूँ एक बेटी
रोज
बेआबरू की जायेगी |
कब
तक चुकानी है कीमत
उसको
एक लड़की होने की
कब
तक एक निर्दोष पर
यूँ
अंगुली उठाई जायेगी |
कब
तक शोषित होगी नारी
इस
सभ्य संकीर्ण समाज में
कब
तक उसके अरमानो की
यूँ
रोज चिता जलाई जायेगी |
कब
तक ..आखिर कब तक ???
सु-मन
शनिवार, 24 नवंबर 2012
वक़्त
ऐ राही !
तुम उसे
जानते हो
वो
तुन्हें जानता भी नहीं
तुम संग
उसके चलते हो
वो ठहरता
भी नहीं
तुम पथ पर
ठोकर खाते हो
वो गिरता
भी नहीं
तुम मंजिल
भूल जाते हो
वो भटकता
भी नहीं
तुम
रिश्तों से घबराते हो
वो बंधता
भी नहीं
तुम भावों
में घिर जाते हो
वो सिमटता
भी नहीं
तुम खोकर
पाना चाहते हो
वो पीछे
हटता भी नहीं
तुम जीत
की चाह रखते हो
वो लड़ता
भी नहीं
तुम फिर
से जीना चाहते हो
वो मरता
भी नहीं
तुम उसे
जानते हो -२
वो तुम्हे जानता भी नहीं
तुम संग
उसके चलते हो
वो ठहरता
भी नहीं
वो ठहरता
भी नहीं !!
सु-मन
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
शब्द से ख़ामोशी तक ...अनकहा मन का
ख़ामोशी में बहुत कुछ
है अब ...सुनने को ....वो भी जो तब नहीं सुन पाई थी .....जब शब्द बात करते थे
....अब चारों पहर बस ख़ामोशी ही गुनगुनाती है हमारे बीच ...और राह तकते शब्द थक कर
सो जाते हैं गहरी नींद ......!!
(शब्दों का न होना
सालता है कभी कभी ....पर ख़ामोशी मन को बांधे है ...दोनों एक दूसरे के पूरक हैं
शायद)
सु-मन
रविवार, 28 अक्टूबर 2012
सोमवार, 25 जून 2012
एक लम्हा
कुछ अरसा पहले
एक लम्हा
ना जाने कहाँ से
उड़ कर आ गिरा
मेरी हथेली पे
कुछ अलग सा
स्पर्श था उसका
यूँ लगा... मानो !
जिंदगी ने आकर
थाम लिया हो हाथ जैसे
और मैंने उस हथेली पर
रख कर दूसरी हथेली
उसे सहेज कर रख लिया |
शायद ये दबी सी ख्वाहिश थी
जिंदगी जीने की.....
वक्त बदलता रहा करवटें
और मैं
उस लम्हे से होकर गुजरती रही
.
.
वहम था शायद !
मेरा उस लम्हे से होकर गुजरना ..
आज, अरसे बाद
वो लम्हा
मांगे है रिहाई मुझसे
अनचाहे ही मैंने
हटा ली हथेली अपनी
कर दिया रिहा उसको
अपने जज्बात की कैद से |
पर ..आज भी उसका स्पर्श
बावस्ता है मेरी इस हथेली पर
दौड रहा है रगों में लहू के संग
यही है जीने का सामान मेरा
यही जिंदगी के खलिश भी है ....!!
सु-मन
रविवार, 17 जून 2012
ऐ बाबुल
बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही
मत तोड़ मुझे डाली से
खिलने दे अपनी बगिया ही …….
बेटा बनकर तुझको संभालूं
बुढ़ापे का बनूँगी सहारा भी
कभी न छोडूंगी तेरा दामन
आँखें बन करुँगी उजियारा भी
बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही......
रिश्ते जहाँ में झूठे हैं सारे
नहीं और रिश्ता तुझसा कोई
क्यूँ कहें दुनिया मोहे ऐ बाबुल
बेटी जैसा बोझ ना दूजा कोई
बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही.....
माँ की लोरी याद है आती
वो मुझको सहलाती बाहें तेरी
पुकारे मुझको घर का आँगन
ये महकती हुई फुलवारी तेरी
बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही.......
बचपन में तूने थामा हाथ मेरा
अब तुझको ना गिरने दूंगी कभी
समय को बदलने दे अपने तेवर
तू डर मत मैं न बदलूंगी कभी
बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही.....
कभी ना भटकूंगी कर्म पथ पर
हर मुश्किल से लड़ लूंगी मैं भी
आशीष तेरा रहे सदा मुझ पर
बस इतना कर्म करना तू भी
बाबुल मोहे रहने दे
अपनी प्यारी बिटिया ही
मत तोड़ मुझे डाली से
खिलने दे अपनी बगिया ही........!!
सु ..मन
रविवार, 10 जून 2012
एक क्षण ठहर कर
14 अप्रेल 1984 में वीर प्रताप अखबार में प्रकाशित मॉम की कविता
दमयंती कपूर
मुझे याद है
जब भी वहाँ
‘उस’ खिडकी से
झाँका करती थी
देखा करती थी मैं
दूर गगन में
ऊन के फाहों की तरह
तैरते
श्वेत – श्याम
बादलों को
सरोवर में खिले
कमल-दलों को |
तब मेरा भी
मन करता था
समीर संग चल दूँ
चल कर
घन-मंडलों में
जल-कण बन
छिप जाऊं
सरसता में सरसाऊं
प्यासी धरा को |
सुगंध सदृश
बस जाऊं सुमन में
खिल जाऊं
जन-जन की मन बगिया में
गुलपकावली के
नव-पुष्पित फूलों की तरह |
लेकिन यहाँ
‘इस’ खिडकी को खोलते ही
सामने आये
भयंकर तूफ़ान
घोर घन-गर्जना
कड़कती बिजली,
महसूस हुआ एक धमाका
अपने भीतर
और अनजाने ही
अजनबी भय से कांपते
हाथों ने मानो
खिडकी बंद कर दी
सदा के लिए अब
अक्सर
सोचती हूँ
मिटा दूँ खुद अपनी हस्ती
न काँटों की चुभन हो
न फूलों सी आह |
लेकिन तभी
‘एक क्षण’
ठहर कर पूछता है मुझसे
क्या
उचित होगा यह
तुम्हारे लिए ?
दमयंती कपूर
शुक्रवार, 8 जून 2012
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