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गुरुवार, 21 मार्च 2013

कल्पवृक्ष












काश ! होता एक ऐसा भी
कल्पवृक्ष
जिसकी शाख पर
लटकी होती
अनगिनत इच्छाएँ
और
उन इच्छाओं को
तोडने के लिए
सींचना पड़ता उसको
प्यार और संवेदना के जल से
तो हर बेबस माँ
रखती उसे हरा-भरा
ताउम्र
और तोड़ लेती
अपने बच्चे की
हर इच्छा
पूरा कर देती
उसका हर सपना

होता यूँ भी
कि जब-जब
गिरता उसका हर आँसू
उसकी जड़ों में 
झरते उसकी शाख से
कागज के हरे हरे पत्ते
तो खरीद लाती वो 
मासूम आँखों में बसा
एक आशियाना ।।
.................

संवेदना के सागर तले झर रही हैं आँखें
कल्पवृक्ष से अब भी झर रहे हैं पत्ते .....!!

*****


सु-मन






बुधवार, 6 मार्च 2013

रुखसत होती जिंदगी



















रुखसत होती जिंदगी
रात की मानिन्द
और गहराती जा रही ....

मौत के साये
छू लेने को आमद
बिल्कुल वैसे
ज्यूँ एक घने जंगल में
अपनी ओर बुलाती
एक सुनसान निर्जन राह ...

सोच में हूँ – कि आखिर
जिंदगी और मौत के
इस सफर के बीच  
जाने कितने रतजगे बाकी हैं  ...!!


सु-मन 

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

प्रेम (अपरिभाषित)


प्रेम इतना विशाल होता है कि जिसको परिभाषित करना नामुमकिन है बिलकुल वैसे....जैसे इस असीमित आकाश को सीमा देना | ईश्वर की सबसे सुंदर कृति इन्सान और इंसान में धड़कता उसका कोमल ह्रदय ..उसमें बहता भावनाओं का दरिया ....और उन भावनाओं से उपजती प्रेम की अभिव्यक्ति......

प्रेम (अपरिभाषित)

सोचा लिखूं... मैं भी
प्रेम की परिभाषा
परिभाषित कर दूँ प्रेम
आज इस प्रेम दिवस पर  
पर ...
मेरे लिए
नहीं हैं प्रेम
मात्र एक दिन की सौगात
न ही
अभिव्यक्ति एक दिन की
मेरे लिए
हर पल है प्रेम
जिसमे सुनती हूँ
मौन तुम्हारा
देखती हूँ अपनी आँखों में
तुम्हारे कुछ बुने सपने
लफ़्ज़ों को देती हूँ
आकार तुम्हारा
सृजित करती हूँ
अपने भीतर
एक नई कोंपल
तुम्हारे नेह की
और
‘मन’ के दर्पण में
देखती हूँ
हर पल खिलता
एक ‘सु-मन’ !!




सु-मन 

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

अनदेखी मंजिल
















बढ़ते क़दमों को
रोकने के प्रयास में
गिरती उठती वो
कब तक संभाल पायेगी
हाथों से गिरते
पलों को
आस में बंधे
खाबों को
कैसे सहेज पाएगी
आँखों से गिरती
उम्मीदों को
धूल में उड़ती
यादों को
ये रास्ता अनदेखी मंजिल का
उसे न जाने
कहाँ ले जायेगा  
क़दमों के निशां रह जायेगें
कारवां बढ़ता जायेगा !!


सु-मन

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

शब्द


शब्द, शब्दों में तलाशते हैं मुझे
और मैं ...उन शब्दों में तुम्हें !

रात जर्द पत्ते सी शबनम को टटोलती
चाँद जुगनू सा मंद मंद बुझा सा
नदी खामोश किनारों को सहलाती हुई
तब दूर कहीं सन्नाटे के जंगल में
सुनाई देता है मुझे दबा सा
कुछ अनकहे अनसुने शब्दों का शोर
धूमिल सी अधकच्चे विचारों की पगडंडी
उस शोर की तरफ बढ़ते अनथक दो कदम
कदम, कदमों में थामते हैं मुझे
और मैं...उन क़दमों में तुम्हे !

शब्द, शब्दों में तलाशते हैं मुझे
और मैं ...उन शब्दों में तुम्हें !!

सु-मन

(Special thanks to Manuj Ji for giving his voice to my words)



सोमवार, 24 दिसंबर 2012

आखिर कब तक ???


कब तक लूटती रहेगी
रोज अस्मत सरे बाज़ार
कब तक यूँ एक बेटी  
रोज बेआबरू की जायेगी |

कब तक चुकानी है कीमत
उसको एक लड़की होने की
कब तक एक निर्दोष पर
यूँ अंगुली उठाई जायेगी |

कब तक शोषित होगी नारी
इस सभ्य संकीर्ण समाज में
कब तक उसके अरमानो की   
यूँ रोज चिता जलाई जायेगी |

कब तक ..आखिर कब तक ???



सु-मन 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

वक़्त



















ऐ राही !
तुम उसे जानते हो
वो तुन्हें जानता भी नहीं
तुम संग उसके चलते हो
वो ठहरता भी नहीं
तुम पथ पर ठोकर खाते हो
वो गिरता भी नहीं
तुम मंजिल भूल जाते हो
वो भटकता भी नहीं
तुम रिश्तों से घबराते हो
वो बंधता भी नहीं
तुम भावों में घिर जाते हो
वो सिमटता भी नहीं
तुम खोकर पाना चाहते हो
वो पीछे हटता भी नहीं
तुम जीत की चाह रखते हो
वो लड़ता भी नहीं
तुम फिर से जीना चाहते हो
वो मरता भी नहीं
तुम उसे जानते हो -२
वो तुम्हे जानता भी नहीं
तुम संग उसके चलते हो
वो ठहरता भी नहीं
वो ठहरता भी नहीं !!


सु-मन  

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

शब्द से ख़ामोशी तक ...अनकहा मन का


ख़ामोशी में बहुत कुछ है अब ...सुनने को ....वो भी जो तब नहीं सुन पाई थी .....जब शब्द बात करते थे ....अब चारों पहर बस ख़ामोशी ही गुनगुनाती है हमारे बीच ...और राह तकते शब्द थक कर सो जाते हैं गहरी नींद ......!!

(शब्दों का न होना सालता है कभी कभी ....पर ख़ामोशी मन को बांधे है ...दोनों एक दूसरे के पूरक हैं शायद)



सु-मन 

रविवार, 28 अक्टूबर 2012

ऐ क्षितिज !















ऐ क्षितिज !

जब लौट जायेंगे सब पाखी
अपने आशियाने की ओर 
और सूरज दबे पाँव धीरे धीरे 
रात के आगोश में चला जायेगा 
आधा चाँद जब दूर कहीं होगा 
चाँदनी के इन्तजार में 
मेघ हौले हौले सूरज को देंगे विदा 
तब तुमसे मिलने आऊंगा 
समा लूँगा तुमको अपने अंदर 
खुद तुममें समा जाऊँगा ....!!

तुम्हारा सागर ...



सु-मन 

सोमवार, 25 जून 2012

एक लम्हा
















कुछ अरसा पहले
एक लम्हा
ना जाने कहाँ से
उड़ कर आ गिरा
मेरी हथेली पे
कुछ अलग सा
स्पर्श था उसका
यूँ लगा... मानो !
जिंदगी ने आकर
थाम लिया हो हाथ जैसे
और मैंने उस हथेली पर
रख कर दूसरी हथेली
उसे सहेज कर रख लिया |

शायद ये दबी सी ख्वाहिश थी
जिंदगी जीने की.....

वक्त बदलता रहा करवटें
और मैं
उस लम्हे से होकर गुजरती रही
.
.
वहम था शायद !
मेरा उस लम्हे से होकर गुजरना ..

आज, अरसे बाद
वो लम्हा
मांगे है रिहाई मुझसे
अनचाहे ही मैंने
हटा ली हथेली अपनी
कर दिया रिहा उसको
अपने जज्बात की कैद से |

पर ..आज भी उसका स्पर्श
बावस्ता है मेरी इस हथेली पर
दौड रहा है रगों में लहू के संग

यही है जीने का सामान मेरा
यही जिंदगी के खलिश भी है ....!!


सु-मन 
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