कुछ क़तरे हैं ये जिन्दगी के.....जो जाने अनजाने.....बरबस ही टपकते रहते हैं.....मेरे मन के आँगन में......
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मंगलवार, 10 सितंबर 2013
सोमवार, 12 अगस्त 2013
शुक्रवार, 2 अगस्त 2013
इक ख़याल की कब्र पर
रात फिर
इक ख़याल की कब्र पर
बैठे रहे कुछ लफ्ज़,
करते रहे इन्तजार उन एहसास का
जो दब कर गुम हो गए थे
उस वक्त उस आखिरी घड़ी,जब
ख़याल, ख़याल न रह कर
कब्र में दफ़न हों गया था उस रोज ....
एक शबनमी बूँद कुछ बीते लम्हों की
उन लफ़्ज़ों पर पड़ी कि अचानक
साँस लेने को कुछ सामान मिला
लरजने लगे वो मिट्टी को कुरेदते हुए
बरसों से दबे ख़याल को सहलाने की खातिर...
पर रूह से बेजान ख़याल ख़ामोश लेटा
किस करवट बदलता भला
कैसे निकल आता उस कब्र से
जिसे अपने हाथों से दफ़न किया था
उस रोज,उस फ़रिश्ते ने जाने क्या सोच कर .....
लफ्ज़ देर रात तक कब्र के सरहाने बैठ
ख़याल की बाहों में उतरने को बेचैन रहे
और ख़याल करता रहा इन्तजार फ़रिश्ते का
भोर की पहली किरण तक ....!!
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इक ख़याल की कब्र पर, लफ्ज़ अधलेटे हैं अभी
इक ख़याल को आज भी फ़रिश्ते का है इन्तजार !!
*****
सु..मन
मंगलवार, 9 जुलाई 2013
बरसना लाज़मी है , हम दोनों के लिए शायद !
रात घिर आई है
अधगीली सड़क पर
आवाजाही कम है ज़रा
सोडियम लैम्प की पीली रौशनी में
भिन-भिनाने लगे हैं कीट पतंगे
सड़क के गीले किनारों पर
तैर रहे सूखे पत्तों में
आने लगी है कुछ नमी |
रात बरसेगा वो
इन हवाओं ने कहा है अभी
मैं बालकनी में बैठ
उसके इन्तजार में हूँ
बरसेगा जरूर बाहर न सही .. भीतर |
***
बरसना लाज़मी है , हम दोनों के लिए शायद !!
सु..मन
शनिवार, 15 जून 2013
ऐ बाबुल बहुत याद आता है तू ...
(पूज्य बाबू जी को समर्पित )
छोड़ इस लोक को ऐ बाबुल
परलोक में अब रहता है तू
कैसे बताऊं तुझको ऐ बाबुल
मेरे मन में अब बसता है तू
बन गए हैं सब अपने पराये
न होकर कितना खलता है तू
देख माँ की अब सूनी कलाई
आँखों से निर्झर बहता है तू
पुकारे तुझको ‘मन’ साँझ सवेरे
मंदिर में दिया बन जलता है तू
ऐ बाबुल बहुत याद आता है तू....
ऐ बाबुल बहुत याद आता है तू..... !!
सु..मन
शनिवार, 25 मई 2013
ऐ मेरे दोस्त..लफ्ज़
ऐ मेरे दोस्त !
सुनो ना....
क्यूँ रहते हो
क्यूँ रहते हो
अब मुझसे तुम
यूँ खफा खफा
जानती हूँ कुछ रोज हुए
नहीं ढाल पाई मैं तुमको
एक नज़्म में
न ही बन पाई मुझसे
कोई कविता ....
ख़याल थक कर
गुम हो गए हैं जैसे
जेहन के किसी कोने में
छिप गए हैं मिलकर सभी ...
जानते हो-
कितना तन्हा होती हूँ
उस वक़्त तुम्हारे बिना
जब डायरी के सफ़ेद पन्नों पर
नहीं होती तुम्हारी आहट
और कलम की बेचैनी
टीस बन चुभती है भीतर कहीं....
बसंत खिल चूका है अब
मौसम के केनवस पर
उभरते हैं रोज नए शेड
उकेरना चाहती हूँ उनको
तुम्हारे संग
इन सफ़ेद कागजों को
चाहती हूँ रंगना
पर .. जाने कब तक
यूँ रहेगा इन पन्नों में
पतझड़ का मौसम
कब तुम उतरोगे रूह में मेरी
यूँ खफा खफा
जानती हूँ कुछ रोज हुए
नहीं ढाल पाई मैं तुमको
एक नज़्म में
न ही बन पाई मुझसे
कोई कविता ....
ख़याल थक कर
गुम हो गए हैं जैसे
जेहन के किसी कोने में
छिप गए हैं मिलकर सभी ...
जानते हो-
कितना तन्हा होती हूँ
उस वक़्त तुम्हारे बिना
जब डायरी के सफ़ेद पन्नों पर
नहीं होती तुम्हारी आहट
और कलम की बेचैनी
टीस बन चुभती है भीतर कहीं....
बसंत खिल चूका है अब
मौसम के केनवस पर
उभरते हैं रोज नए शेड
उकेरना चाहती हूँ उनको
तुम्हारे संग
इन सफ़ेद कागजों को
चाहती हूँ रंगना
पर .. जाने कब तक
यूँ रहेगा इन पन्नों में
पतझड़ का मौसम
कब तुम उतरोगे रूह में मेरी
जाने कब
लफ्ज़ों की बरसात होगी ।।
सु..मन
शनिवार, 20 अप्रैल 2013
ऐ मेरे नादान दिल
ऐ मेरे नादान दिल, अब तो संभल जा
सच का सामना कर, सपनों को भूल जा
सेहरा-ए-जिंदगी है ये, गहरा सागर नहीं है
अनबुझी सी है प्यास, न तू इसमें डूब जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो ....
सुलगती शमा है ये, सिंदूरी शाम नहीं है
अनबुझी सी है प्यास, न तू इसमें डूब जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो ....
सुलगती शमा है ये, सिंदूरी शाम नहीं है
पिघलता है जिस्म इसमें, न तू इसमें जल जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो .....
महफ़िल-ए-तन्हाई है ये, जश्न-ए-शाम नहीं है
तिश्नगी है जाम इसका, न तू इसे पिए जा
ऐ मेरे नादान दिल अब तो .....
उल्फत का दरिया है, ठहरा साहिल नहीं है
डूबते हैं अरमान इसमें, न तू इसमें बह जा
ऐ मेरे नादान दिल, अब तो संभल जा
सच का सामना कर, सपनों को भूल जा !!
सु-मन
गुरुवार, 21 मार्च 2013
कल्पवृक्ष
काश ! होता एक ऐसा भी
कल्पवृक्ष
जिसकी शाख पर
लटकी होती
अनगिनत इच्छाएँ
और
उन इच्छाओं को
तोडने के लिए
सींचना पड़ता उसको
प्यार और संवेदना के जल से
तो हर बेबस माँ
रखती उसे हरा-भरा
ताउम्र
और तोड़ लेती
अपने बच्चे की
हर इच्छा
पूरा कर देती
उसका हर सपना ।
होता यूँ भी
कि जब-जब
गिरता उसका हर आँसू
उसकी जड़ों में
झरते उसकी शाख से
कागज के हरे हरे पत्ते
तो खरीद लाती वो
मासूम आँखों में बसा
एक आशियाना ।।
.................
संवेदना के सागर तले झर रही
हैं आँखें
कल्पवृक्ष से अब भी झर रहे
हैं पत्ते .....!!
*****
सु-मन
बुधवार, 6 मार्च 2013
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
प्रेम (अपरिभाषित)
प्रेम
इतना विशाल होता है कि जिसको परिभाषित करना नामुमकिन है बिलकुल वैसे....जैसे इस
असीमित आकाश को सीमा देना | ईश्वर की सबसे सुंदर कृति इन्सान और इंसान में धड़कता
उसका कोमल ह्रदय ..उसमें बहता भावनाओं का दरिया ....और उन भावनाओं से उपजती प्रेम
की अभिव्यक्ति......
प्रेम
(अपरिभाषित)
सोचा
लिखूं... मैं भी
प्रेम
की परिभाषा
परिभाषित
कर दूँ प्रेम
आज
इस प्रेम दिवस पर
पर
...
मेरे
लिए
नहीं
हैं प्रेम
मात्र
एक दिन की सौगात
न
ही
अभिव्यक्ति
एक दिन की
मेरे
लिए
हर
पल है प्रेम
जिसमे
सुनती हूँ
मौन
तुम्हारा
देखती
हूँ अपनी आँखों में
तुम्हारे
कुछ बुने सपने
लफ़्ज़ों
को देती हूँ
आकार
तुम्हारा
सृजित
करती हूँ
अपने
भीतर
एक
नई कोंपल
तुम्हारे
नेह की
और
‘मन’
के दर्पण में
देखती
हूँ
हर
पल खिलता
एक
‘सु-मन’ !!
सु-मन
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