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शुक्रवार, 7 मार्च 2014

वक्त की तासीर














दिन गरम है अब 
और रातें ठण्डी 

सुना है -
सूरज को लग गया है 
मुहब्बत का रोग 
सुलगने लगा है दिन भर 

शाम की माँग में 
टपकने लगा है 
उमस का सिन्धूर 
आसमां रहने लगा है ख़ामोश 

रात कहरा कर 
ढक लेती है 
ओस का आँचल 
चाँद भटकता है तन्हा रातभर 
****************

बदल रहा है मौसम शायद 
वक्त के बयार की तासीर बदल रही है !!


सु-मन 





बुधवार, 29 जनवरी 2014

बता मन मेरे..गीत लिखूँ कौन सा !











शब्द सारे खो गए 
छा गया है मौन सा
अब तू बता मन मेरे 
गीत लिखूँ कौन सा ।

शब्द सागर है भरा  
साहिल है बेचैन सा
अब तू बता मन मेरे 
मोती चुनूँ कौन सा ।

ज्वलंत हैं अभिलाषाएँ 
अस्तित्व है गौण सा 
अब तू बता मन मेरे 
रास्ता बढूँ कौन सा ।

नेह हृदय है बह रहा
माझी है निष्प्राण सा
अब तू बता मन मेरे 
पतवार ढूँढू कौन सा ।

अब तू बता मन मेरे
गीत लिखूँ कौन सा ....!!

सु..मन

रविवार, 12 जनवरी 2014

माँ सुनो !
















(बेटी दिवस पर)

माँ सुनो !

जब पहली बार 
किया था महसूस 
अपने गर्भ में 
मेरा वजूद 
तो बताओ ना 
मेरी धड़कन में 
किसे जिया था तुमने 
एक बेटा या बेटी ।

जब कभी 
अकेले में बैठ 
करती थी मुझसे बात 
क्या कुछ पनपता था 
तुम्हारे भीतर 
एक बेटी की चाह
या बेटे का सपना ।

जब पहली बार 
गूँजी मेरी किलकारी 
लिया था अपने हाथों में 
तुम्हारी सोच की हकीकत को 
बताओ ना 
कैसे स्वीकारा था तुमने ।
.
.
.
तुम मौन हो माँ 
जानती हूँ तुम्हारी चुप्पी 
इतने बरस 
बेटी के वजूद को 
महसूस करती आई हूँ 
तुमसे होकर गुजरती 
तय कर रही हूँ 
तुम्हारे गर्भ से इस घर तक सफ़र !!

तुम्हारी बेटी


सु..मन

शनिवार, 23 नवंबर 2013

जिजीविषा











गूंजने लगे हैं
फिर वही सन्नाटे
जिन्हें छोड़ आए थे
दूर कहीं ... बहुत दूर
तकने लगी हैं
फिर वही राहें
जो छूट गई थी
पीछे ... बहुत पीछे |

ख़याल मन में नहीं बसते अब
बस इसे छूकर निकल जाते हैं
बावरा मन समझ गया है
ख़याल मेहमान है
आये, आकर चले गए
हकीकत साथी है
चलेगी दूर तलक |

ये दो नयन भी नहीं छलकते अब
सेहरा बन गए हैं शायद
जिनमें उग आए हैं
कुछ यादों के कैक्टस
जिनके काँटों की चुभन से
कभी निकल आते हैं
अश्क के कतरे
जज़्ब हों जाते हैं
लबों तक आते आते |

घर में भी इंसान नहीं रहते अब
बस घूमती हैं चलती फिरती लाशें
नहीं पकती चूल्हे पर रोटी
खाली बर्तन को सेंकते
लकड़ी के अधजले टुकड़े
बिखेरते रहते हैं धुआं
तर कर देते हैं 
ये शुष्क आँखें |

कुछ इस तरह
जिंदगी को मिल जाती है
टुकड़ों टुकड़ों में
जीने के लिए
जिजीविषा !!






 सु..मन 

रविवार, 3 नवंबर 2013

जल रहे हैं दीपक













जल रहे हैं दीपक 

सबके आँगन 
चल रहे हैं 
पटाखे फुलझडियाँ 
सज रहे हैं द्वार 
लक्ष्मी के स्वागत में ...

ये देखते हुए 

जलाया है किसी ने 
पिछले बरस खरीदा 
अधटूटा सा दीपक 
घर के द्वार पर 
तुम्हारे लिए .....

रखी है उसने 

अपने हिस्से की 
एक पूरी कुछ हलवा 
मिला है जो उसको 
आज सुबह 
एक मंदिर के बाहर 
भीख के कटोरे में .....

सोच में हूँ 

क्या आओगी तुम 
उस द्वार 
या जलेगा वो दीपक 
फिर तन्हा 
यूँ ही अगले बरस...... !!



सु..मन 

(हे माँ ! सभी की झोली खुशियों से भर दो ...सभी को दीपावली की मंगलकामनाएं ...) 

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

करवाचौथ ..करवे बिन











(माँ की नज़र से पूज्य बाबू जी को समर्पित )

जानती हूँ
तुम अब नहीं हो
न ही रची है
मेरे हाथों में
तेरे नाम की मेहंदी
सुर्ख लाल चूड़ियों की खनक
जुदा है अब मेरे वजूद से
चाँद सा टीका
अब दूर छिटक गया है
झिलमिल सितारों वाली चुनरी
रंगरेज़ ने कर दी है
स्याह काली
नहीं सजाऊँगी मैं अब
करवे की थाल ।

पर ..सुनो !
रात, जब
चाँद निकलेगा ना
तुम उसकी खिड़की से झांकना
मैं मन के दर्पण में
देख लूंगी तुम्हारा अक्स
हाँ ,नहीं कर पाऊँगी
मंगल कामना
तुम्हारी लम्बी उम्र की
कि अब तुम देह बंधन से परे
जा उस लोक में
कर रहे मेरा इंतजार
और इस देह बंधन में बंधी
मैं कर रही तुमको नमन !!



सु..मन

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

उम्र पार की वो औरत











इक पड़ाव पर ठहर कर
अपनी सोच को कर जुदा
सिमट एक दायरे में
करती स्व का विसर्जन
चलती है एक अलग डगर
उम्र पार की वो औरत |

देह के पिंजर में कैद
उम्र को पल-पल संभालती
वक्त के दर्पण की दरार से
निहारती अपने दो अक्स
ढूंढती है उसमे अपना वजूद
उम्र पार की वो औरत |

नियति के चक्रवात में
बह जाते जब मांग टीका
कलाई से लेते हैं रुखसत
कुछ रंग बिरंगे ख्वाब
दिखती है एक जिन्दा लाश  
उम्र पार की वो औरत |

नए रिश्तों की चकाचौंध में
उपेक्षित हो अपने अंश से
बन जाती एक मेहमान
खुद अपने ही आशियाने में
तकती है मौत की राह
उम्र पार की वो औरत !!


सु..मन




मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

बदला सा सब ..












ना फिज़ा बदली ना शहर बदला 
इस जगह से मेरा ठिकाना बदला 

दो घड़ी रुक ऐ वक्त तू मेरे लिए 
मेरे हिस्से का तेरा पैमाना बदला 

शब ना हो उदास इस कदर तन्हा 
वही है जाम बस मयखाना बदला 

लिखने का सबब नहीं कोई 'मन' 
मेरे लफ्ज़ो अब आशियाना बदला !!



सु..मन 



शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

इक उदास नज़्म











शाम की दहलीज पर
जब उदासी देती है दस्तक
खाली जाम लेकर
दौड़ आते हैं
कुछ लफ्ज़ मेरी ओर
भर देती हूँ
कुछ बेहिसाब से पल
छलकने लगता है भरा जाम
लेती हूँ एक घूँट
गहरी हो जाती है उदासी
बिखर जाते हैं लफ्ज़
बन जाती है
इक उदास नज़्म ....!!


सु..मन 

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सितम्बर की अध ठंडी रात












सितम्बर की इस अध ठंडी रात में
मैं देख रही हूँ
अपने हिस्से का एक खुला आकाश
और उसमे उजला सा आधा चाँद |

आधे आँगन में पड़ती
40 वोल्ट के बल्व की मद्धम रोशनी
मेरे जिस्म को छूकर
स्पन्दन सा करती ये मस्त बयार |

पास बुलाते गहरे साये से पेड़
मुझे लग रहे मेरे हमसफ़र
सुन रहा मुझे
झींगुरों का ये मधुर संगीत |

स्वप्न सा प्रतीत होता यथार्थ
मेरी आँखों को दे रहा सकून
मन कह रहा हौले से
कुछ अनकहा कुछ अनसुना !!



सु..मन 
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