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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

उम्र पार की वो औरत











इक पड़ाव पर ठहर कर
अपनी सोच को कर जुदा
सिमट एक दायरे में
करती स्व का विसर्जन
चलती है एक अलग डगर
उम्र पार की वो औरत |

देह के पिंजर में कैद
उम्र को पल-पल संभालती
वक्त के दर्पण की दरार से
निहारती अपने दो अक्स
ढूंढती है उसमे अपना वजूद
उम्र पार की वो औरत |

नियति के चक्रवात में
बह जाते जब मांग टीका
कलाई से लेते हैं रुखसत
कुछ रंग बिरंगे ख्वाब
दिखती है एक जिन्दा लाश  
उम्र पार की वो औरत |

नए रिश्तों की चकाचौंध में
उपेक्षित हो अपने अंश से
बन जाती एक मेहमान
खुद अपने ही आशियाने में
तकती है मौत की राह
उम्र पार की वो औरत !!


सु..मन




मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

बदला सा सब ..












ना फिज़ा बदली ना शहर बदला 
इस जगह से मेरा ठिकाना बदला 

दो घड़ी रुक ऐ वक्त तू मेरे लिए 
मेरे हिस्से का तेरा पैमाना बदला 

शब ना हो उदास इस कदर तन्हा 
वही है जाम बस मयखाना बदला 

लिखने का सबब नहीं कोई 'मन' 
मेरे लफ्ज़ो अब आशियाना बदला !!



सु..मन 



शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

इक उदास नज़्म











शाम की दहलीज पर
जब उदासी देती है दस्तक
खाली जाम लेकर
दौड़ आते हैं
कुछ लफ्ज़ मेरी ओर
भर देती हूँ
कुछ बेहिसाब से पल
छलकने लगता है भरा जाम
लेती हूँ एक घूँट
गहरी हो जाती है उदासी
बिखर जाते हैं लफ्ज़
बन जाती है
इक उदास नज़्म ....!!


सु..मन 

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

सितम्बर की अध ठंडी रात












सितम्बर की इस अध ठंडी रात में
मैं देख रही हूँ
अपने हिस्से का एक खुला आकाश
और उसमे उजला सा आधा चाँद |

आधे आँगन में पड़ती
40 वोल्ट के बल्व की मद्धम रोशनी
मेरे जिस्म को छूकर
स्पन्दन सा करती ये मस्त बयार |

पास बुलाते गहरे साये से पेड़
मुझे लग रहे मेरे हमसफ़र
सुन रहा मुझे
झींगुरों का ये मधुर संगीत |

स्वप्न सा प्रतीत होता यथार्थ
मेरी आँखों को दे रहा सकून
मन कह रहा हौले से
कुछ अनकहा कुछ अनसुना !!



सु..मन 

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

वक्त की सलीब


















वक्त की सलीब पर
टांग दिए हैं वो लम्हें
गाढ़ दी है फासलों की खूंटी 

जिंदगी का एक टुकड़ा
ले रहा अब आखिरी साँसे !!



सु..मन 

सोमवार, 12 अगस्त 2013

माँ (हायकु )










     
       १ 
माँ का हृदय 
करता इंतजार 
सूना आँगन |

      २ 
देख खिलौने 
झरते झर झर 
माँ के नयन |

      ३ 
कोख है खाली 
दर दर भटकी  
माँ की ममता |

      ४ 
बेसहारा माँ 
ताने कई हज़ार 
कोख में बेटी |

      ५ 
जाया पेट का 
जाता अकेला छोड़ 
अंतिम यात्रा |



सु..मन 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

इक ख़याल की कब्र पर












रात फिर
इक ख़याल की कब्र पर
बैठे रहे कुछ लफ्ज़,
करते रहे इन्तजार उन एहसास का
जो दब कर गुम हो गए थे
उस वक्त उस आखिरी घड़ी,जब
ख़याल, ख़याल न रह कर
कब्र में दफ़न हों गया था उस रोज ....

एक शबनमी बूँद कुछ बीते लम्हों की
उन लफ़्ज़ों पर पड़ी कि अचानक
साँस लेने को कुछ सामान मिला
लरजने लगे वो मिट्टी को कुरेदते हुए
बरसों से दबे ख़याल को सहलाने की खातिर...

पर रूह से बेजान ख़याल ख़ामोश लेटा
किस करवट बदलता भला
कैसे निकल आता उस कब्र से
जिसे अपने हाथों से दफ़न किया था
उस रोज,उस फ़रिश्ते ने जाने क्या सोच कर .....

लफ्ज़ देर रात तक कब्र के सरहाने बैठ
ख़याल की बाहों में उतरने को बेचैन रहे
और ख़याल करता रहा इन्तजार फ़रिश्ते का
भोर की पहली किरण तक ....!!

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इक ख़याल की कब्र पर, लफ्ज़ अधलेटे हैं अभी
इक ख़याल को आज भी फ़रिश्ते का है इन्तजार !!
             *****



सु..मन 

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

बरसना लाज़मी है , हम दोनों के लिए शायद !
















रात घिर आई है 
अधगीली सड़क पर 
आवाजाही कम है ज़रा 
सोडियम लैम्प की पीली रौशनी में 
भिन-भिनाने लगे हैं कीट पतंगे 
सड़क के गीले किनारों पर 
तैर रहे सूखे पत्तों में 
आने लगी है कुछ नमी |

रात बरसेगा वो 
इन हवाओं ने कहा है अभी 
मैं बालकनी में बैठ 
उसके इन्तजार में हूँ 
बरसेगा जरूर बाहर न सही .. भीतर |
***
बरसना लाज़मी है , हम दोनों के लिए शायद !!


सु..मन 


शनिवार, 15 जून 2013

ऐ बाबुल बहुत याद आता है तू ...

(पूज्य बाबू जी को समर्पित )















छोड़ इस लोक को ऐ बाबुल
परलोक में अब रहता है तू

कैसे बताऊं तुझको ऐ बाबुल
मेरे मन में अब बसता है तू

बन गए हैं सब अपने पराये
न होकर कितना खलता है तू

देख माँ की अब सूनी कलाई
आँखों से निर्झर बहता है तू

पुकारे तुझको ‘मन’ साँझ सवेरे
मंदिर में दिया बन जलता है तू  

ऐ बाबुल बहुत याद आता है तू....
ऐ बाबुल बहुत याद आता है तू..... !!


सु..मन

शनिवार, 25 मई 2013

ऐ मेरे दोस्त..लफ्ज़















ऐ मेरे दोस्त !
सुनो ना....
क्यूँ रहते हो 
अब मुझसे तुम
यूँ खफा खफा
जानती हूँ कुछ रोज हुए
नहीं ढाल पाई मैं तुमको
एक नज़्म में
न ही बन पाई मुझसे
कोई कविता ....
ख़याल थक कर
गुम हो गए हैं जैसे
जेहन के किसी कोने में
छिप गए हैं मिलकर सभी ...
जानते हो-
कितना तन्हा होती हूँ
उस वक़्त तुम्हारे बिना
जब डायरी के सफ़ेद पन्नों पर
नहीं होती तुम्हारी आहट
और कलम की बेचैनी
टीस बन चुभती है भीतर कहीं....
बसंत खिल चूका है अब
मौसम के केनवस पर
उभरते हैं रोज नए शेड
उकेरना चाहती हूँ उनको
तुम्हारे संग
इन सफ़ेद कागजों को
चाहती हूँ रंगना
पर .. जाने कब तक
यूँ रहेगा इन पन्नों में
पतझड़ का मौसम
कब तुम उतरोगे रूह में मेरी 
जाने कब 
लफ्ज़ों की बरसात होगी ।।


सु..मन

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